High CourtsSingle Bench(2026) 09 CHH CK 2843

United India Insurance Company Limited vs Manmohan & Ors.

Chhattisgarh High Court · Decided on 16 September 2026

HON’BLE JUDGES
Sanjay Kumar Jaiswal, J
CASE NUMBER
MA(C) No. 302 of 2026

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Judgment

17 paragraphs · 1,417 words

न्यायमूर्ति श्री संजय कुमार जायसवाल

!! निर्णय पीठ पर पारित !!

1.

मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 173 के अंतर्गत प्रस्तुत इस अपील में प्रथम अपर मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, कटघोरा, जिला-कोरबा (छत्तीसगढ़) द्वारा दावा प्रकरण क्रमांक 05/2024, “मनमोहन वगैरह विरुद्ध देवलाल धनवार वगैरह” में पारित अधिनियम दिनांक 18/07/2025 को चुनौती दी गई है । उक्त अधिनियम द्वारा दावाकर्तागण के पक्ष में ₹12,20,000/- की प्रतिकर राशि, 7% वार्षिक ब्याज सहित, अधिनियमित की गई है तथा उक्त प्रतिकर राशि के भुगतान हेतु बीमा कंपनी को उत्तरदायी ठहराया गया है । उक्त अधिनियम को आगे संक्षेप में “प्रश्नाधीन अधिनियम” से संबोधित किया जा रहा है ।

2.

प्रकरण के तथ्य, संक्षेप में, इस प्रकार हैं कि दिनांक 16.10.2023 को अमन कुमार (आयु 13 वर्ष) मोटरसाइकिल से जा रहा था । उसी समय प्रत्यर्थी क्रमांक-5 देवलाल धनवार द्वारा हाइवा ट्रक क्रमांक सी.जी.-12-सी.-3365 (जिसे आगे संक्षेप में “दोषी वाहन” से संबोधित किया जा रहा है) को तेज गति एवं लापरवाहीपूर्वक चलाया गया जिसकी ठोकर लगने के फलस्वरूप अमन कुमार को गंभीर चोटें आईं और उसकी मृत्यु हो गई । उक्त घटना के संबंध में थाना-बांगो में अपराध क्रमांक 170/2023 पंजीबद्ध किया गया तथा विवेचना उपरांत अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया ।

3.

मृतक अमन कुमार की दुर्घटना में मृत्यु के फलस्वरूप उसके माता-पिता, भाई एवं दादी द्वारा मोटर यान अधिनियम की धारा 166 के अंतर्गत प्रतिकर हेतु दावा आवेदन प्रस्तुत किया गया। उक्त दावा आवेदन पर जांच उपरांत अधिकरण द्वारा दावाकर्तागण के पक्ष में “प्रश्नाधीन अधिनियम” पारित किया गया तथा “दोषी वाहन” को अपीलार्थी-बीमा कंपनी से बीमित पाए जाने के आधार पर अपीलार्थी-बीमा कंपनी को प्रतिकर राशि के भुगतान हेतु उत्तरदायी ठहराया गया। जिसे इस अपील में चुनौती दी गई है।

4.

अपीलार्थी-बीमा कंपनी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि “दोषी वाहन” को दुर्घटना में झूठे रूप से संलिप्त किया गया है, जबकि उक्त वाहन से कोई दुर्घटना घटित नहीं हुई थी। दुर्घटना दिनांक 16/10/2023 की है, जबकि प्रथम सूचना पत्र दिनांक 17/10/2023 को अज्ञात वाहन के विरुद्ध दर्ज की गई थी। आपराधिक प्रकरण में मर्ग सूचना, शव परीक्षण प्रतिवेदन सहित अन्य दस्तावेजों में भी दुर्घटना अज्ञात वाहन से होना अंकित है। इसके लगभग 50 दिवस पश्चात दिनांक 06/12/2023 को बीमित वाहन को जब्त कर उसे दुर्घटना में संलिप्त बताया गया है। यह भी तर्क दिया है कि जिन व्यक्तियों को घटना का प्रत्यक्षदर्शी अथवा मौके का साक्षी बताया गया है, उनका परीक्षण नहीं कराया गया है। केवल कांता प्रसाद सिंह (चश्मदीद साक्षी) का परीक्षण कराया गया है, जबकि पुलिस द्वारा उसका कोई कथन लेखबद्ध नहीं किया गया था। अतः उपलब्ध साक्ष्य एवं अभिलेख से “दोषी वाहन” की दुर्घटना में संलिप्तता प्रमाणित नहीं होती है। अपीलार्थी-बीमा कंपनी को प्रतिकर राशि के भुगतान हेतु उत्तरदायी ठहराया जाना त्रुटिपूर्ण है। अतः अपील स्वीकार कर अपीलार्थी-बीमा कंपनी को उक्त दायित्व से उन्मोचित किया जाये।

5.

इसके विपरीत, दावाकर्ता/प्रत्यर्थी क्रमांक-1 से 4 के विद्वान अधिवक्ता ने अपील का विरोध करते हुए तर्क प्रस्तुत किया कि अधिकरण द्वारा अभिलेख पर उपलब्ध मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य का समुचित मूल्यांकन कर विधिसम्मत निष्कर्ष अभिलिखित किया गया है। अपीलार्थी बीमा कंपनी का तर्क स्वीकार योग्य नहीं है। अतः अपील खारिज किया जाए।

6.

उपस्थित पक्ष के तर्क श्रवण किए गए तथा अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया।

7.

दावाकर्ता पक्ष की ओर से मृतक के पिता मनमोहन (जो घटना के प्रत्यक्षदर्शी नहीं हैं) द्वारा परीक्षण में अभियोगपत्र के दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियां प्रस्तुत की गई हैं। अंतिम प्रतिवेदन प्रदर्श पी-1 से यह परिलक्षित होता है कि विवेचना उपरांत पुलिस द्वारा “दोषी वाहन” को दुर्घटना में संलिप्त पाया गया तथा उसके चालक देवलाल धनवार के विरुद्ध अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया है।

8.

दावाकर्ता पक्ष की ओर से घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी के रूप में कांता प्रसाद सिंह का परीक्षण कराया गया है। उक्त साक्षी ने दावाकर्ता पक्ष के कथन की पुष्टि करते हुए बताया है कि “दोषी वाहन” के चालक द्वारा वाहन को तेज गति एवं लापरवाहीपूर्वक चलाए जाने के कारण दुर्घटना घटित हुई, जिसके फलस्वरूप अमन कुमार की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई थी। यद्यपि प्रतिपरीक्षण में उक्त साक्षी ने स्वीकार किया है कि उसने पुलिस के समक्ष अपना बयान नहीं दिया था, तथापि उसने स्वतः कहा है कि उसने दुर्घटना को प्रत्यक्ष रूप से देखा था तथा घटना के पश्चात 112 एवं 108 नंबर पर फोन कर पुलिस एवं एंबुलेंस को बुलाया था और मृतक के परिजनों को भी घटना की सूचना दी थी। उक्त कथन का प्रतिपरीक्षण के दौरान खण्डन नहीं किया जा सका है।

9.

अपीलार्थी-बीमा कंपनी की ओर से सहायक प्रबंधक रामशरण सिंह जगत (अनावेदक साक्षी क्रमांक-2) का परीक्षण कराया गया है, जिसने अपीलार्थी-बीमा कंपनी के तर्क के अनुरूप कथन किया है कि प्रथम सूचना पत्र में अज्ञात वाहन का उल्लेख है तथा अपीलार्थी की ओर से प्रकरण में अन्वेषक नियुक्त किया गया था, जिसके प्रतिवेदन में भी "दोषी वाहन" की दुर्घटना में संलिप्तता नहीं पाई गई है। अन्वेषक के रूप में प्रार्थना खण्डेलवाल (अनावेदक साक्षी क्रमांक-1) का परीक्षण कराया गया है। उक्त साक्षी ने प्रदर्श पी-2 प्रथम सूचना पत्र, प्रदर्श पी-3 शव परीक्षण आवेदन तथा प्रदर्श पी-4 जब्ती आदि दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए कथन किया है कि "दोषी वाहन" की जब्ती किए जाने के पूर्व तक पुलिस की विवेचना में ऐसा कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है, जिससे उक्त वाहन की दुर्घटना में संलिप्तता प्रदर्शित होती हो। उसने अपनी ओर से "दोषी वाहन" का यांत्रिक परीक्षण प्रतिवेदन प्रदर्श डी-1, मोटरसाइकिल का यांत्रिक परीक्षण प्रतिवेदन प्रदर्श डी-3 तथा साक्षी प्रीतम कुमार पटेल, आशीष कुमार, रामलाल धनवार एवं विजय कुमार धनवार के पुलिस कथनों को क्रमशः प्रदर्श डी-4 से डी-7 के रूप में प्रस्तुत कर उल्लेख किया है उसमें "दोषी वाहन" का क्रमांक नहीं बताया गया है। प्रतिपरीक्षण में प्रार्थना खण्डेलवाल ने यह स्वीकार किया है कि उसके द्वारा प्रस्तुत समस्त दस्तावेज पुलिस द्वारा तैयार किए गए दस्तावेज हैं तथा उसे इस बात की जानकारी नहीं है कि पुलिस द्वारा "दोषी वाहन" के चालक के विरुद्ध किस आधार पर अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया है।

10.

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायदृष्टांत Mangla Ram v. Oriental Insurance Co. Ltd., (2018) 5 SCC 656 में प्रतिपादित किया है कि पुलिस अभिलेख, विशेषकर प्रथम सूचना पत्र एवं अभियोगपत्र, दुर्घटना तथा उसमें चालक की संलिप्तता के संबंध में प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य का आधार बन सकते हैं। ऐसे अभिलेख प्रस्तुत किए जाने पर उनके प्रभाव को निष्प्रभावी करने का दायित्व उस पक्ष पर आ जाता है जो वाहन की संलिप्तता अथवा चालक की लापरवाही से इंकार करता है।

11.

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायदृष्टांत Geeta Dubey v. United India Insurance Co. Ltd., 2024 SCC OnLine SC 3779 में प्रतिपादित किया है कि मोटर दुर्घटना दावा प्रकरण में, आपराधिक मामलों में लागू “युक्तियुक्त संदेह से परे” प्रमाण के कठोर मानदंड को लागू नहीं किया जा सकता, बल्कि दावे का परीक्षण “संभावनाओं की प्रबलता” के आधार पर किया जाना चाहिए।

12.

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायदृष्टांत Meera Bai & Ors. v. ICICI Lombard General Insurance Company Ltd. & Anr., 2025 SCC OnLine SC 992 में यह प्रतिपादित किया है कि केवल प्रत्यक्षदर्शी साक्षी का अभाव, मोटर दुर्घटना प्रतिकर के दावे को निरस्त करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता, यदि दुर्घटना एवं लापरवाही का युक्तिसंगत निष्कर्ष प्रथम सूचना पत्र, अभियोगपत्र एवं अन्य आधिकारिक अभिलेखों से निकाला जा सकता हो।

13.

उपरोक्त न्यायदृष्टांतों के प्रकाश में विचार करने पर यह स्पष्ट है कि मौके के साक्षी के रूप में परीक्षित कांता प्रसाद सिंह भले ही पुलिस के अंतिम प्रतिवेदन में सूचीबद्ध साक्षी नहीं है, किंतु न्यायालयीन कथन में वह अखण्डित रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि बीमा कंपनी की ओर से परीक्षित साक्षी मौके के साक्षी नहीं हैं तथा उनके साक्ष्य का विशेष महत्व इसलिए भी नहीं है कि वे न तो घटना के प्रत्यक्षदर्शी हैं और न ही विवेचना के संबंध में किसी प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर कथन कर रहे हैं। उनके द्वारा पुलिस अभिलेखों के आधार पर किया गया कथन मूल साक्ष्य नहीं माना जा सकता। इसके विपरीत, न्यायालय के समक्ष मौके के साक्षी के रूप में परीक्षित कांता प्रसाद सिंह मूल साक्षी है तथा उसके कथनों का समर्थन पुलिस द्वारा प्रस्तुत अभियोगपत्र से भी होता है, जिसका प्रभावी खण्डन नहीं हो सका है।

14.

ऐसी दशा में साक्षी कांता प्रसाद सिंह का कथन जो पुलिस के अभियोगपत्र द्वारा समर्थित है तथा न्यायदृष्टांतों में प्रतिपादित सिद्धांत को दृष्टिगत रखते हुए, यह न्यायालय पाती है कि अपीलार्थी-बीमा कंपनी का तर्क स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है। अधिकरण द्वारा पारित “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” अभिलेख पर उपलब्ध मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य के अनुरूप होने से उसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पायी जाती। फलस्वरूप, अपील स्वीकार योग्य नहीं होने से खारिज की जाती है।

15.

निर्णय की प्रति के साथ अधिकरण का अभिलेख शीघ्रतापूर्वक आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचनार्थ व पालनार्थ वापस प्रेषित हो।