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Judgment
न्यायमूर्ति श्री संजय कुमार जायसवाल
मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 173 के अंतर्गत प्रस्तुत इस अपील में अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, गरियाबंद, जिला-गरियाबंद (छत्तीसगढ़) द्वारा दावा प्रकरण क्रमांक 13/2021, “संतोषी वगैरह विरुद्ध घनश्याम ध्रुव वगैरह” में पारित अधिनिर्णय दिनांक 01/03/2024 को चुनौती दी गई है, जिसके तहत अपीलार्थी-बीमा कंपनी के विरुद्ध तथा दावाकर्तागण के पक्ष में ₹15,44,200/- की राशि का अधिनिर्णय ब्याज सहित पारित किया गया है तथा उक्त राशि के भुगतान के लिए अपीलार्थी-बीमा कंपनी को उत्तरदायी ठहराया गया है। उक्त अधिनिर्णय को आगे संक्षेप में “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” से संबोधित किया जा रहा है।
प्रकरण के तथ्य, संक्षेप में, इस प्रकार हैं कि टकेश्वर निर्मलकर (मृतक) दिनांक 09/02/2020 को प्रातः लगभग 09:00 बजे मोटरसाइकिल से जा रहा था और सुनील पोल्ट्री फॉर्म के पास पहुंचा था। उसी समय मोटरसाइकिल क्रमांक सी.जी.-23-एच.-7461 (जिसे आगे संक्षेप में “दोषी वाहन” से संबोधित किया जा रहा है) को उसका चालक घनश्याम ध्रुव तेज गति एवं लापरवाहीपूर्वक चलाते हुए आया जिसकी ठोकर के फलस्वरूप आई गंभीर चोटों के कारण मृतक को मेकाहारा ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। उक्त घटना के संबंध में थाना फिंगेश्वर, जिला गरियाबंद में अपराध क्रमांक 57/2020, धारा 304(क), भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध किया गया तथा विवेचना उपरांत अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया ।
मृतक टकेश्वर निर्मलकर की उक्त दुर्घटना में मृत्यु के फलस्वरूप उसकी पत्नी, दो संतान एवं माता द्वारा मोटर यान अधिनियम की धारा 166 के अंतर्गत प्रतिकर की मांग करते हुए दावा आवेदन प्रस्तुत किया गया । अधिकरण द्वारा यह पाया गया कि दोषी वाहन अपीलार्थी-बीमा कंपनी से बीमित था । साथ ही, यह भी निर्धारित किया गया कि दोषी वाहन के चालन में बीमा शर्तों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है । अतः अपीलार्थी-बीमा कंपनी के विरुद्ध ₹15,44,200/- की प्रतिकर राशि ब्याज सहित अधिनिर्णीत की गई । उक्त निष्कर्ष को अपीलार्थी-बीमा कंपनी द्वारा इस अपील में चुनौती दी गई है ।
अपीलार्थी-बीमा कंपनी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि दुर्घटना के समय दोषी वाहन का वास्तविक चालक शेखर ध्रुव था, जिसके पास वैध चालन अनुज्ञप्ति नहीं थी । इसके बावजूद, बीमा कंपनी को उत्तरदायी ठहराने के उद्देश्य से दोषी वाहन के चालक के रूप में घनश्याम ध्रुव का नाम दर्शाया गया तथा उसके विरुद्ध अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया है । चूंकि वास्तविक चालक शेखर ध्रुव के पास वैध चालन अनुज्ञप्ति नहीं थी, अतः बीमा शर्तों का उल्लंघन हुआ है । ऐसी स्थिति में अपीलार्थी-बीमा कंपनी किसी प्रतिकर के भुगतान के लिए उत्तरदायी नहीं है । फलतः, अपील स्वीकार कर अपीलार्थी-बीमा कंपनी के विरुद्ध पारित “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” को अपास्त किया जावे ।
दावाकर्ता/प्रत्यर्थी क्रमांक 1 से 4 के विद्वान अधिवक्ता ने “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” का समर्थन किया है ।
चालक-स्वामी/प्रत्यर्थी क्रमांक 5 एवं 6 के विद्वान अधिवक्ता ने अपील का विरोध करते हुए तर्क प्रस्तुत किया कि अधिकरण द्वारा अभिलेख पर उपलब्ध मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य का समुचित मूल्यांकन करने के पश्चात विधिसम्मत निष्कर्ष अभिलिखित किया गया है। अपीलार्थी-बीमा कंपनी का तर्क स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है। अतः अपील खारिज किए जाने का निवेदन किया गया है।
उभयपक्ष के तर्क श्रवण किए गए तथा अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया।
प्रकरण में दावाकर्ता पक्ष की ओर से मृतक की पत्नी संतोषी निर्मलकर तथा मौके के साक्षी के रूप में गणेश कुमार मार्कण्डेय का परीक्षण कराया गया है। दूसरी ओर, बीमा कंपनी की ओर से उसके विधि अधिकारी शुभम यादव का परीक्षण कराया गया है। शुभम यादव ने दोषी वाहन का बीमित होना स्वीकार किया है। शुभम यादव ने कंपनी के अन्वेषक ओम प्रकाश जोशी द्वारा तैयार जांच प्रतिवेदन प्रदर्श डी-1 के साथ-साथ अन्य दस्तावेज प्रदर्श डी-5 से प्रदर्श डी-16 तक प्रस्तुत किए हैं। उल्लेखनीय है कि शुभम यादव न तो घटना का प्रत्यक्षदर्शी है और न ही अन्वेषक ओम प्रकाश जोशी द्वारा तैयार जांच प्रतिवेदन को प्रस्तुत अथवा प्रमाणित करने के लिए सक्षम साक्षी है।
अपीलार्थी-बीमा कंपनी की ओर से यह आपत्ति ली गई है कि दुर्घटना के समय दोषी वाहन का वास्तविक चालक शेखर ध्रुव था, जबकि पश्चातवर्ती रूप से घनश्याम ध्रुव को चालक दर्शाते हुए उसके विरुद्ध अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया तथा दावा आवेदन पेश किया गया। किंतु अभिलेख के परिशीलन से स्पष्ट है कि इस आशय का कोई भी अभिवचन अपीलार्थी-बीमा कंपनी द्वारा प्रस्तुत जवाबदावा में नहीं किया गया है। इस प्रकार, अपीलार्थी-बीमा कंपनी का उक्त तर्क किसी अभिवचन पर आधारित नहीं है। यह स्थापित विधिक सिद्धांत है कि प्रत्येक मामले में अभिवचन ही उसके मामले का आधार (नींव) होता है। ऐसी स्थिति में अपीलार्थी-बीमा कंपनी द्वारा बिना किसी अभिवचन के उक्त तर्क के आधार पर अपना पक्ष रखा गया है, जिसका कोई आधारभूत अभिवचन अभिलेख पर उपलब्ध नहीं है।
अपीलार्थी-बीमा कंपनी का यह भी तर्क है कि वास्तविक चालक का नाम प्रदर्श डी-2 के रूप में प्रस्तुत दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था और इसी आधार पर यह कहा गया है कि दुर्घटना के समय दोषी वाहन का वास्तविक चालक शेखर ध्रुव था। उल्लेखनीय है कि दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित उक्त समाचार का स्रोत क्या था, यह अभिलेख से स्पष्ट नहीं होता है। न ही ऐसे किसी स्रोत अथवा समाचार उपलब्ध कराने वाले व्यक्ति का बीमा कंपनी की ओर से परीक्षण कराया गया है। ऐसी स्थिति में दैनिक समाचार पत्र प्रदर्श डी-2 में प्रकाशित समाचार की विषयवस्तु का कोई साक्षिक महत्व नहीं है।
प्रकरण में मौके के साक्षी के रूप में गणेश कुमार मार्कण्डेय का परीक्षण दावाकर्ता पक्ष की ओर से कराया गया है। यद्यपि उसका नाम अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य सूची में नहीं है, तथापि गणेश कुमार मार्कण्डेय, जो ग्राम फिंगेश्वर का ही निवासी है, ने मौके के साक्षी के रूप में घटना को देखना बताते हुए कहा है कि जब वह पोल्ट्री फॉर्म से वापस जाने के लिए अपने मित्र की प्रतीक्षा कर रहा था, तब उसने दुर्घटना होते हुए देखी थी तथा दोषी वाहन को घनश्याम चला रहा था। उल्लेखनीय है कि पुलिस द्वारा घनश्याम ध्रुव को ही उक्त दुर्घटना के लिए अभियोजित करते हुए उसके विरुद्ध अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया है। साथ ही, गणेश कुमार मार्कण्डेय के उक्त कथन का प्रतिपरीक्षण में प्रभावी रूप से खण्डन नहीं हो सका है। इस प्रकार, दावाकर्ता पक्ष की ओर से दुर्घटना के समय दोषी वाहन का चालक घनश्याम ध्रुव का होना बताया गया है और पुलिस द्वारा भी उसी के विरुद्ध अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया है। इसके विपरीत, अपीलार्थी-बीमा कंपनी के विधि अधिकारी शुभम यादव द्वारा प्रस्तुत अन्वेषण प्रतिवेदन न तो उसके द्वारा तैयार किया गया है और न ही वह उसे तैयार करने वाले अन्वेषक का स्थान लेकर उसकी विषयवस्तु को प्रमाणित करने वाला सक्षम साक्षी है। वह स्वयं घटना का प्रत्यक्षदर्शी भी नहीं है। जिस समाचार पत्र के आधार पर शेखर ध्रुव को वास्तविक चालक बताया जा रहा है, उसकी विषयवस्तु का भी कोई साक्षिक महत्व नहीं है।
इस प्रकार, उपरोक्त विवेचना के आधार पर यह न्यायालय पाती है कि अपीलार्थी-बीमा कंपनी का तर्क स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है। अधिकरण द्वारा पारित “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” अभिलेख पर उपलब्ध मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य के अनुरूप होने से उसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पायी जाती। फलस्वरूप, अपील स्वीकार योग्य नहीं होने से खारिज की जाती है।
निर्णय की प्रति के साथ अधिकरण का अभिलेख शीघ्रतापूर्वक आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचनार्थ व पालनार्थ वापस प्रेषित हो।
