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Judgment
मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 173 के अंतर्गत प्रस्तुत इस अपील में तृतीय अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, बस्तर स्थान जगदलपुर (छत्तीसगढ़) द्वारा दावा प्रकरण क्रमांक 229/2019, “श्रीमती नीलोबाई विरुद्ध सुदुराम कश्यप वगैरह” में पारित अधिनियम दिनांक 03/12/2022 को चुनौती दी गई है। उक्त अधिनियम द्वारा दावाकर्ता के पक्ष में ₹5,00,000/- की प्रतिकर राशि, 9% वार्षिक ब्याज सहित, अधिनियमित की गई है तथा उक्त प्रतिकर राशि के भुगतान हेतु अपीलार्थी बीमा कंपनी को उत्तरदायी ठहराया गया है। जिस अधिनियम को आगे संक्षेप में “प्रश्नाधीन अधिनियम” से संबोधित किया जा रहा है।
प्रकरण के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार हैं कि 60 वर्षीय नानूराम मौर्य दिनांक 04/01/2019 को पिकअप वाहन क्रमांक सी.जी.-05-डी.-0275 (जिसे आगे संक्षेप में “दोषी वाहन” से संबोधित किया जा रहा है) में हमाल के रूप में सवार होकर ग्राम रतेंगा जा रहा था। जब उक्त वाहन कपारी नाला के पास पहुँचा, तब उसे चालक सुदुराम कश्यप द्वारा चलाया जा रहा था। इसी दौरान उक्त वाहन घटनास्थल पर पलट गया, जिससे उसमें सवार नानूराम मौर्य को गंभीर चोटें आईं और परिणामस्वरूप उसकी मृत्यु हो गई। तत्पश्चात्, उसकी पत्नी श्रीमती नीलोबाई मौर्य द्वारा धारा 163 (क), मोटर यान अधिनियम, 1988 के अंतर्गत दावा आवेदन प्रस्तुत किया गया। अधिकरण द्वारा दावा प्रमाणित पाया गया तथा यह निर्धारित किया गया कि “दोषी वाहन”, अपीलार्थी/बीमा कंपनी से बीमित था, किंतु दुर्घटना के समय उसके चालक के पास वैध एवं प्रभावी चालक अनुज्ञप्ति नहीं थी। फलतः, अधिकरण द्वारा “अदायगी एवं वसूली” के सिद्धांत को लागू करते हुए ₹5,00,000/- की प्रतिकर राशि 9% वार्षिक ब्याज सहित अधिनिर्णीत की गई। उक्त अधिनिर्णय को इस अपील के माध्यम से चुनौती दी गई है।
अपीलार्थी/बीमा कंपनी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि मृतक नानूराम मौर्य “दोषी वाहन” में हमाल के रूप में सवार नहीं था तथा पॉलिसी के अंतर्गत उसका जोखिम आच्छादित नहीं था। यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि दुर्घटना के समय “दोषी वाहन” के चालक के पास वैध एवं प्रभावी चालक अनुज्ञप्ति नहीं थी, जिसके कारण बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ। अतः अपीलार्थी/बीमा कंपनी को प्रतिकर के दायित्व से उन्मुक्त किया जाए।
वाहन चालक/प्रत्यर्थी क्रमांक-2 के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि मृतक नानूराम मौर्य दुर्घटनाकारित वाहन में सवार था तथा वह उसमें हमाल के रूप में कार्यरत था, जिसका जोखिम बीमा पॉलिसी के अंतर्गत आच्छादित था। अतः अधिकरण द्वारा पारित अधिनिर्णय विधि एवं अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य के अनुरूप है तथा उसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। फलतः, अपील खारिज किया जाए।
उपस्थित पक्ष का तर्क श्रवण किया गया तथा अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया।
अभिलेख के परिशीलन से यह स्थिति स्पष्ट होती है कि दोषी वाहन का चालक सुदुराम कश्यप था तथा उक्त वाहन अपीलार्थी/बीमा कंपनी से बीमित थी, जिसकी बीमा पॉलिसी प्रदर्श डी-1 है। उक्त वाहन मालवाहक था। दावाकर्ता श्रीमती नीलोबाई मौर्य तथा मौके के साक्षी लेदरूराम मौर्य के कथनों के आधार पर अधिकरण द्वारा यह निष्कर्ष अभिलिखित किया गया है कि दुर्घटना के समय मृतक दोषी वाहन में हमाल के रूप में सवार था। उसका जोखिम बीमा पॉलिसी के अंतर्गत आच्छादित था। अभिलेख पर उपलब्ध उक्त साक्ष्य के सम्यक् परिशीलन से अधिकरण द्वारा अभिलिखित उक्त निष्कर्ष में कोई त्रुटि परिलक्षित नहीं होती है, जिससे उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। फलतः, अपीलार्थी/बीमा कंपनी का यह प्रथम तर्क कि मृतक “दोषी वाहन” में हमाल के रूप में सवार नहीं था तथा उसका जोखिम बीमा पॉलिसी के अंतर्गत आच्छादित नहीं था, स्वीकार योग्य नहीं है।
जहाँ तक “अदायगी एवं वसूली” के सिद्धांत का प्रश्न है? अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य से यह स्पष्ट रूप से स्थापित है कि दुर्घटना की तिथि को “दोषी वाहन” प्रदर्श डी-1 के अनुसार अपीलार्थी/बीमा कंपनी से बीमित था। इस संबंध में अपीलार्थी/बीमा कंपनी की ओर से परीक्षित सहायक श्रेणी-III महेश कुमार भारती (अनावेदक साक्षी क्रमांक-1) तथा प्रशासनिक अधिकारी शहबाज सिद्दीकी (अनावेदक साक्षी क्रमांक-2) के कथनों एवं जिला परिवहन कार्यालय, जगदलपुर से प्राप्त अभिलेखीय साक्ष्य के परिशीलन के आधार पर अधिकरण द्वारा यह निष्कर्षित किया गया कि दुर्घटना के समय वाहन चालक के पास वैध एवं प्रभावी चालक अनुज्ञप्ति नहीं थी, जिसके कारण बीमा पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन पाया गया। ऐसी स्थिति में, अधिकरण द्वारा अपीलार्थी/बीमा कंपनी को “अदायगी एवं वसूली” के सिद्धांत के अंतर्गत अधिनिर्णीत प्रतिकर राशि का प्रथमतः भुगतान करने का दायित्व अधिरोपित किया गया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायदृष्टांत Amrit Paul Singh and Another v. Tata AIG General Insurance Company Limited and Others, (2018) 7 SCC 558 तथा न्यायदृष्टांत Sunita and Others v. United India Insurance Co. Ltd. and Others, 2025 SCC OnLine SC 1464 में प्रतिपादित विधि-सिद्धांत तथा वर्तमान प्रकरण के तथ्य एवं परिस्थितियों के सम्यक् परिशीलन से यह स्पष्ट है कि अधिकरण द्वारा “अदायगी एवं वसूली” का सिद्धांत लागू करते हुए पारित अधिनियम विधि के अनुरूप है जिसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
ऐसी दशा में, उपरोक्त न्यायदृष्टांतों में प्रतिपादित सिद्धांत को दृष्टिगत रखते हुए, यह न्यायालय पाती है कि अपीलार्थी-बीमा कंपनी का तर्क स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है। अधिकरण द्वारा पारित “प्रश्नाधीन अधिनियम” अभिलेख पर उपलब्ध मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य के अनुरूप होने से उसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पायी जाती। फलस्वरूप, अपील स्वीकार योग्य नहीं होने से खारिज की जाती है।
निर्णय की प्रति के साथ अधिकरण का अभिलेख शीघ्रतापूर्वक आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचनार्थ व पालनार्थ वापस प्रेषित हो।
