High CourtsSingle Bench(2026) 10 CHH CK 2520

The Oriental Insurance Company Limited vs Smt. Salma Khan & Ors.

Chhattisgarh High Court, Bilaspur · Decided on 15 October 2026

HON’BLE JUDGES
Sanjay Kumar Jaiswal, J
RESULT
Dismissed
CASE NUMBER
MA(C) No. 2308 of 2024

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Judgment

13 paragraphs · 1,111 words

न्यायमूर्ति श्री संजय कुमार जायसवाल

1.

मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 173 के अंतर्गत प्रस्तुत इस अपील में प्रथम अपर मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, जगदलपुर, जिला-बस्तर (छत्तीसगढ़) द्वारा दावा प्रकरण क्रमांक 74/2016, “श्रीमती सलमा खान वगैरह विरुद्ध सचिन जायसवाल वगैरह” में पारित अधिनियम दिनांक 24/07/2024 को चुनौती दी गई है। उक्त अधिनियम को आगे संक्षेप में “प्रश्नाधीन अधिनियम” से संबोधित किया जा रहा है।

2.

प्रकरण के तथ्य, संक्षेप में, इस प्रकार हैं कि अब्दुल रहिम (मृतक) दिनांक 02/01/2016 को अपनी मोटरसाइकिल से डिमरापाल, मेडिकल कॉलेज के सामने से जा रहा था। उसी समय सचिन जायसवाल मोटरसाइकिल क्रमांक सी.जी.-17-के.के.-1433 (जिसे आगे संक्षेप में “दोषी वाहन” से सम्बोधित किया जा रहा है) को तेज गति एवं लापरवाहीपूर्वक चलाते हुए आया, जिसकी ठोकर के फलस्वरूप आई गंभीर चोटों के कारण अब्दुल रहिम को अस्पताल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। उक्त घटना के संबंध में थाना परपा, जिला बस्तर, छत्तीसगढ़ में अपराध क्रमांक 02/2016 अंतर्गत धारा 304(क) भारतीय दण्ड संहिता में अपराध पंजीबद्ध किया गया।

3.

मृतक अब्दुल रहिम की उक्त दुर्घटना में मृत्यु के फलस्वरूप उसकी पत्नी, दो संतान एवं माता-पिता द्वारा मोटर यान अधिनियम की धारा 166 के अंतर्गत प्रतिकर की मांग करते हुए दावा आवेदन प्रस्तुत किया गया। जिस पर विधिवत सुनवाई के पश्चात अधिकरण द्वारा “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” पारित किया गया तथा दावाकर्तागण के पक्ष में ₹44,02,252/- की प्रतिकर राशि ब्याज सहित अधिनिर्णीत की गई, जिसमें “दोषी वाहन” की अपीलार्थी-बीमा कंपनी को उत्तरदायी ठहराया गया है। उक्त निष्कर्ष को अपीलार्थी-बीमा कंपनी द्वारा इस अपील में चुनौती दी गई है।

4.

अपीलार्थी-बीमा कंपनी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि उनके द्वारा मृतक अब्दुल रहिम की योगदायी उपेक्षा का अभिवचन किया गया था, जिसे अधिकरण द्वारा मान्य नहीं किया गया है, जबकि उनकी ओर से इस संबंध में कंपनी के प्रशासनिक अधिकारी शिव सुब्रहमणयम अययर (अनावेदक साक्षी क्रमांक-1) एवं अन्वेषक अमरेन्द्र कुमार दीक्षित (अनावेदक साक्षी क्रमांक-2) का परीक्षण कराया गया है। उनके द्वारा “दोषी वाहन” के चालक सचिन जायसवाल द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत पर पुलिस द्वारा दर्ज प्रथम सूचना पत्र तथा उस पर की गई विवेचना से संबंधित दस्तावेजी साक्ष्य प्रदर्श एन.ए.-2 से एन.ए.-18 तक प्रस्तुत किए गए हैं। उक्त रिपोर्ट मृतक अब्दुल रहिम के विरुद्ध दर्ज की गई थी, किंतु उसकी मृत्यु हो जाने के कारण पुलिस द्वारा उसमें खात्मा किया गया है। उनका तर्क है कि दुर्घटना में अब्दुल रहिम की भी योगदायी उपेक्षा थी। अतः उसकी योगदायी उपेक्षा मान्य करते हुए उसके विरुद्ध पारित अधिनिर्णय को यथाआवश्यक संशोधित किया जाए।

5.

दावाकर्ता/प्रत्यर्थी क्रमांक 1 से 5 के विद्वान अधिवक्ता ने अपील का विरोध करते हुए तर्क प्रस्तुत किया है कि मृतक अब्दुल रहिम की कोई योगदायी उपेक्षा नहीं थी, बल्कि दुर्घटना के लिए पूर्ण रूप से “दोषी वाहन” का चालक सचिन जायसवाल उत्तरदायी रहा है। मृतक अब्दुल रहिम की योगदायी उपेक्षा को प्रमाणित करने के लिए अपीलार्थी-बीमा कंपनी अथवा “दोषी वाहन” के चालक/स्वामी की ओर से कोई विश्वसनीय एवं ग्राह्य साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है। अधिकरण द्वारा अभिलेख पर उपलब्ध मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य का समुचित मूल्यांकन करने के पश्चात विधिसम्मत निष्कर्ष अभिलिखित किया गया है। अपीलार्थी-बीमा कंपनी का तर्क स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है। अतः अपील खारिज किए जाने का निवेदन किया गया है।

6.

उपस्थित पक्ष के तर्क श्रवण किए गए तथा अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया।

7.

समग्र अभिलेख के परिशीलन से यह स्थिति स्पष्ट होती है कि मौके के साक्षी के रूप में अब्दुल अमीन (आवेदक साक्षी क्रमांक-2) का परीक्षण दावाकर्ता पक्ष की ओर से कराया गया है। अब्दुल अमीन पुलिस द्वारा प्रस्तुत अंतिम प्रतिवेदन प्रदर्श एन.ए.-10 के अनुसार सूचीबद्ध साक्षी है तथा उसने अपने न्यायालयीन कथन में इस तथ्य की पुष्टि की है कि दुर्घटना “दोषी वाहन” के चालक सचिन जायसवाल द्वारा वाहन को उपेक्षापूर्वक एवं उतावलेपन से चलाए जाने के कारण हुई थी। उक्त कथन का कोई प्रभावी खण्डन नहीं किया जा सका है। बल्कि अब्दुल अमीन का कथन दावाकर्ता पक्ष की ओर से प्रस्तुत पुलिस के चालानी दस्तावेजों की प्रतिलिपियां, प्रदर्श ए-1 से ए-10, से समर्थित है, जिनके अनुसार “दोषी वाहन” के चालक सचिन जायसवाल की उपेक्षा एवं उतावलेपन के कारण दुर्घटना होना दर्शित है।

8.

दूसरी ओर, अपीलार्थी-बीमा कंपनी की ओर से प्रस्तुत साक्ष्य के अवलोकन से यह परिलक्षित होता है कि कंपनी के प्रशासनिक अधिकारी शिव सुब्रहमणयम अययर ने बीमा पॉलिसी प्रदर्श एन.ए.-1 प्रस्तुत की है तथा अपने कंपनी के अन्वेषक से विवेचना कराया जाना बताया है। अन्वेषक के रूप में अमरेन्द्र कुमार दीक्षित ने अपने साक्ष्य में अन्वेषण प्रतिवेदन प्रदर्श एन.ए.-3 का उल्लेख करते हुए कहा है कि उसने दुर्घटना से संबंधित आपराधिक प्रकरण के दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियां प्राप्त की थीं। दस्तावेजों के रूप में उक्त साक्षी ने “दोषी वाहन” के चालक सचिन जायसवाल द्वारा लिखाई गई रिपोर्ट के आधार पर पुलिस द्वारा की गई विवेचना में संकलित प्रदर्श एन.ए.-5 से प्रदर्श एन.ए.-18 तक के दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं।

9.

उल्लेखनीय है कि कंपनी का विधिक अधिकारी शिव सुब्रहमणयम अययर न तो मौके का साक्षी है और न ही उसने स्वयं किसी प्रकार की विवेचना की है। अतः योगदायी उपेक्षा के विषय में उसकी साक्ष्य का विधिक महत्व नहीं है। इसी प्रकार, अमरेन्द्र कुमार दीक्षित, जो कंपनी का अन्वेषक है, द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेज पुलिस विवेचना से संबंधित दस्तावेज हैं और उन्हें प्रमाणित करने हेतु अन्वेषक अमरेन्द्र कुमार दीक्षित को सक्षम साक्षी नहीं कहा जा सकता। पुलिस विवेचना में संकलित साक्ष्य का प्रतिपादन विवेचक द्वारा किया जा सकता है अथवा जिस व्यक्ति ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई हो या कथन दिया हो, उसे न्यायालय के समक्ष साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया जाना आवश्यक था, जो इस मामले में नहीं किया गया है।

10.

योगदायी उपेक्षा को स्पष्ट रूप से स्थापित करने हेतु प्रमुख साक्षी “दोषी वाहन” का चालक सचिन जायसवाल हो सकता था, जो उपलब्ध भी था, किंतु अपीलार्थी-बीमा कंपनी द्वारा उसे साक्षी के रूप में आहूत नहीं किया गया। अपीलार्थी-बीमा कंपनी की ओर से ऐसा कोई साक्ष्य भी प्रस्तुत नहीं किया गया है, जिसे साक्ष्य विधि के अंतर्गत ग्राह्य मानते हुए निर्णय में विचारणीय बनाया जा सके। इस प्रकार, अपीलार्थी-बीमा कंपनी की ओर से प्रस्तुत दस्तावेजों एवं साक्ष्य का योगदायी उपेक्षा के प्रश्न पर अपेक्षित विधिक महत्व नहीं है। पर्याप्त एवं ग्राह्य साक्ष्य के अभाव में अपीलार्थी-बीमा कंपनी यह स्थापित करने में असफल रही है कि मृतक अब्दुल रहिम की दुर्घटना में कोई योगदायी उपेक्षा थी।

11.

इस प्रकार, उपरोक्त विवेचना के आधार पर यह न्यायालय पाती है कि अपीलार्थी-बीमा कंपनी का तर्क स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है। अधिकरण द्वारा पारित “प्रश्नाधीन अधिनियम” अभिलेख पर उपलब्ध मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य के अनुरूप होने से उसमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं पायी जाती। फलस्वरूप, अपील स्वीकार योग्य नहीं होने से खारिज की जाती है।

12.

निर्णय की प्रति के साथ अधिकरण का अभिलेख शीघ्रतापूर्वक आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचनार्थ व पालनार्थ वापस प्रेषित हो।