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Judgment
अधीनस्थ न्यायालय, अपर जिला न्यायाधीश, क्रम-5, जयपुर नगर, जयपुर द्वारा दीवानी वाद संख्या-84/2002 में पारित निर्णय एवं डिक्री दिनांकित 03.12.2003, जिसके तहत प्रत्यर्थी-वादी का वाद बाबत संविदा की विनिर्दिष्ट अनुपालना डिक्री किया गया, से व्यथित होकर अपीलार्थी-प्रतिवादी की ओर से यह अपील प्रस्तुत की गई है।
इस न्यायालय की समकक्ष पीठ के आदेश दिनांक 27. 01.2004 के तहत यह अपील विचारार्थ ग्रहण की जा चुकी है। दोनों पक्षों को सुना गया।
योग्य अधिवक्ता अपीलार्थी-प्रतिवादी का कथन रहा कि अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पारित निर्णय व डिक्री विधि के प्रावधानों के प्रतिकूल है। उनका कथन रहा कि अधीनस्थ न्यायालय ने मूल रूप से अपीलार्थी-प्रतिवादी की साक्ष्य बन्द होने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए, प्रत्यर्थी-वादी का वाद साक्ष्य से प्रमाणित हुए बिना डिक्री किया है। उनका यह भी कथन रहा कि अपीलार्थी-प्रतिवादी की साक्ष्य बंद होने के बावजूद, प्रत्यर्थी-वादी को अपने पैरों पर खड़े होकर, समुचित साक्ष्य से अपना प्रकरण साबित करना आवश्यक है।
उनका यह भी कथन रहा कि अधीनस्थ न्यायालय में प्रस्तुत एग्रीमेण्ट के साथ संलग्न नक्शे पर अपीलार्थी-प्रतिवादी के हस्ताक्षर नहीं है एवं नक्शे को सम्पत्ति का भाग नहीं माना जा सकता। उनका यह भी कथन रहा कि पक्षां के मध्य 39 लाख रूपये में सौदा हुआ है, जिसके क्रम में अपीलार्थी-प्रतिवादी द्वारा अपने जवाबदावे में अभिवचन भी लिया गया है, लेकिन अधीनस्थ न्यायालय ने सम्पत्ति का सौदा मात्र 3,90,000/- रूपये में होना मानकर सम्पूर्ण राशि के भुगतान के आधार पर वाद डिक्री किया है। उनके अनुसार एग्रीमेण्ट की राशि के क्रम में अपीलार्थी-प्रतिवादी की ओर से उठाये गये ऐतराज के खण्डन में प्रत्यर्थी-वादी द्वारा कोई विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की गई है।
बहस के दौरान उनका यह भी तर्क रहा कि एग्रीमेण्ट के समय बैंक से लोन लिये जाने के कारण वादग्रस्त सम्पत्ति बैंक के पास गिरवी/बंधक ;उवतजहंहमद्ध थी तथा बंधक सम्पत्ति के बाबत न तो एग्रीमेण्ट किया जा सकता एवं न ही संविदा की विनिर्दिष्ट अनुपालना के क्रम में डिक्री पारित की जा सकती है। उनका कथन रहा कि अपीलार्थी-प्रतिवादी को साक्ष्य प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर प्रदान नहीं किया गया है। अपीलार्थी-प्रतिवादी घटना के समय अधीनस्थ न्यायालय के क्षेत्राधिकार में नहीं रहकर, अन्य स्थान पर निवास कर रही थी। अतः अपील स्वीकार की जाकर अधीनस्थ न्यायालय का निर्णय व डिक्री अपास्त किये जाने की प्रार्थना की गई।
इन तर्कों का खण्डन करते हुए योग्य अधिवक्ता प्रत्यर्थी-वादी का कथन रहा कि अधीनस्थ न्यायालय ने दोनों पक्षों के अभिवचनों के आधार पर, प्रकरण में कुल चार विवाधक कायम किये हैं एवं चारों विवाधकों के क्रम में अपीलार्थी-प्रतिवादी द्वारा उठाये गये ऐतराज कवर होते हैं तथा अधीनस्थ न्यायालय ने प्रत्येक विवाधक पर अपना विस्तृत विवेचन व कारण अंकित करते हुए निर्णय पारित किया है, जिसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं होने से अपील खारिज किये जाने की प्रार्थना की गई।
समस्त तथ्यों पर विचार किया गया। प्रकरण की तथ्यात्मक स्थिति के अनुसार प्रत्यर्थी-वादी ने अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष संविदा की विनिर्दिष्ट अनुपालना के क्रम में वाद प्रस्तुत कर वादपत्र में वर्णित सम्पत्ति के क्रम में दिनांक 24.04.1997 को इकरारनामा निष्पादित होना एवं इकरारनामा में अंकित सम्पत्ति अपीलार्थी-प्रतिवादी द्वारा प्रत्यर्थी-वादी को 3,90,000/- रूपये में बेचना स्वीकार करते हुए उक्त राशि का भुगतान अपीलार्थी-प्रतिवादी को जरिये बैंक पे ऑडर कर दिया जाना अंकित किया। वादपत्र के अनुसार विक्रय पत्र निर्धारित दो माह की अवधि में निष्पादित नहीं कराये जाने पर वाद प्रस्तुत कर संविदा की अनुपालना कराये जाने की प्रार्थना की गई।
वादपत्र में अंकित अभिवचनों के खण्डन में अपीलार्थी-प्रतिवादी की ओर से जवाबदावा प्रस्तुत कर मूल रूप से पक्षों के मध्य 39 लाख रूपये में सौदा होना एवं विक्रय मूल्य अदा करने का समय एक वर्ष तय होना बताया। एग्रीमेण्ट के साथ संलग्न नक्शे में किसी भी पक्षकार के हस्ताक्षर नहीं होना बताया एवं एग्रीमेण्ट अपूर्ण होना बताकर दावा खारिज किये जाने की प्रार्थना की गई।
अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पक्षकारान के अभिवचनों के आधार पर निम्न विवाधक विरचित किये।
आया प्रतिवादी ने अपने मकान नं. 114 गोम्स डिफेंस कोलोनी का वादपत्र के चरण क्रम 1 में वर्णित एक भाग वादी को 3,90,000 रूपये में विक्रय किया व विक्रय राशि प्राप्त कर विक्रय अनुबंध निष्पादित किया व दो माह में रजिस्ट्री करना तय किया।
आया वादी को प्रतिवादी की ओर से विक्रय अनुबंध के तहत वादग्रस्त परिसर का कब्जा सम्भला दिया।
आया वादी विक्रय अनुबंध दिनांक 24.4.97 के तहत अपना पार्ट पूरा करने के लिये सदैव इच्छुक व तत्पर रहा है एवं प्रतिवादीगण बावजूद नोटिस रजिस्ट्री नहीं करवा रही है।
अनुतोष।
साक्ष्य वादी में दो गवाहान को परीक्षित करवाकर कुल 10 दस्तावेजात प्रदर्शित करवाये गये। जबकि प्रतिवादी की ओर से कोई साक्ष्य पेश नहीं हुई।
बहस के दौरान योग्य अधिवक्ता अपीलार्थी-प्रतिवादी की ओर से प्रस्तुत समस्त तर्कों के क्रम में सर्वप्रथम अपीलार्थी-प्रतिवादी को साक्ष्य हेतु पर्याप्त अवसर नहीं दिये जाने के तर्क पर विचार करते हैं, यदि उक्त तर्क/ऐतराज अपीलार्थी-प्रतिवादी प्रमाणित करने में सफल रहता है तो निश्चित रूप से अन्य तर्कों पर विवेचन की आवश्यकता शेष नहीं रहती है, बल्कि अन्य तर्कों पर उसी की रोशनी में विचार कर निष्कर्ष दिया जा सकता है।
इस क्रम में जहॉं तक अधीनस्थ न्यायालय की आदेशिकाओं का प्रश्न है, अधीनस्थ न्यायालय की पत्रावली के अवलोकन से प्रकट होता है कि वादी साक्ष्य दिनांक 12.09.2003 को समाप्त करने के पश्चात प्रकरण वादी की तरदीदी साक्ष्य में सुरक्षित रखते हुए प्रतिवादी साक्ष्य हेतु नियत किया गया। तत्पश्चात आगामी पेशी दिनांक 06.10.2003 को प्रतिवादी की ओर से गवाह उपस्थित नहीं होने पर साक्ष्य हेतु दिनांक 28.10.2003 की तारीख नियत की गई। दिनांक 28.10.2003 को भी प्रतिवादी साक्ष्य उपस्थित नहीं होने पर अन्तिम अवसर साक्ष्य हेतु दिया जाकर पत्रावली दिनांक 19.11. 2003 को रखी गई। दिनांक 19.11.2003 को प्रतिवादी गवाह उपस्थित नहीं हुए तथा न ही प्रतिवादी की ओर से साक्ष्य प्रस्तुत करने हेतु किसी प्रकार के अवसर की मांग की गई, जबकि आदेशिका के अवलोकन से प्रकट होता है कि अधीनस्थ न्यायालय ने प्रतिवादी द्वारा साक्ष्य बंद करने के निवेदन पर ही प्रतिवादी साक्ष्य बंद की गई।
इस न्यायालय की राय में जहॉं न्यायालय द्वारा प्रतिवादी को साक्ष्य प्रस्तुत करने हेतु तीन अवसर दिये जाने के बावजूद भी प्रतिवादी की ओर से साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किये जाने एव तत्पश्चात अन्तिम बार जब न्यायालय द्वारा प्रतिवादी की साक्ष्य बंद की गई, तब भी प्रतिवादी द्वारा किसी प्रकार की साक्ष्य पेश करने हेतु अवसर नहीं चाहने एवं स्वयं साक्ष्य बंद किये जाने के निवेदन पर साक्ष्य बंद की गई, ऐसी स्थिति में इस न्यायालय के समक्ष बहस के दौरान योग्य अधिवक्ता अपीलार्थी-प्रतिवादी की ओर से जो तर्क प्रस्तुत किये गये हैं, वे उपरोक्त विवेचन की रोशनी में स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है।
योग्य अधिवक्ता अपीलार्थी-प्रतिवादी द्वारा एग्रीमेण्ट के निष्पादन के क्रम में जो तर्क उठाये गये हैं, उन तर्कों से यह तथ्य स्वीकृत है कि अपीलार्थी-प्रतिवादी द्वारा एग्रीमेण्ट प्रत्यर्थी-वादी के पक्ष में निष्पादित किया गया है। एग्रीमेण्ट के निष्पादन को अधीनस्थ न्यायालय द्वारा विवाधक संख्या-1 के तहत किये गये विवेचन से भी प्रमाणित माना गया है, जिसके खण्डन में किसी प्रकार की साक्ष्य अपीलार्थी-प्रतिवादी की ओर से अधीनस्थ न्यायालय में प्रस्तुत नहीं की गई है।
जहॉं तक एग्रीमेण्ट में अंकित राशि का प्रश्न है, इस क्रम में एग्रीमेण्ट के अवलोकन से प्रकट होता है कि 3,90,000/- रूपये की राशि न केवल अंकों में लिखी गई है, बल्कि शब्दों में भी उसका उल्लेख है। द ूसरी ओर प्रदर्श-3 रसीद से भी यह स्पष्ट है कि राशि प्राप्त करने के बाबत 3,90,000/- रूपये का शब्दों व अंकों में हवाला है एवं किसी प्रकार की राशि शेष नहीं होना बताया गया है। अपीलार्थी-प्रतिवादी की ओर से एग्रीमेण्ट की राशि के बाबत जो ऐतराज जवाबदावा में लिया गया है, वह प्रथमदृष्टया वादी के दस्तावेजात की रोशनी में स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है। फिर भी अपीलार्थी-प्रतिवादी का यदि इस क्रम में वास्तव में कोई बचाव होता तो निश्चित रूप से अपीलार्थी-प्रतिवादी अधीनस्थ न्यायालय में साक्ष्य हेतु अवश्य उपस्थित होता, लेकिन दस्तावेजी साक्ष्य के खण्डन में मौखिक साक्ष्य भी अपीलार्थी-प्रतिवादी की ओर से प्रस्तुत नहीं करने पर, अधीनस्थ न्यायालय द्वारा एग्रीमेण्ट की राशि 3,90,000/- रूपये मानकर निर्णय पारित किया गया है, जिसमें कोई त्रुटि नहीं है। योग्य अधिवक्ता अपीलार्थी-प्रतिवादी की ओर से मूल रूप से एग्रीमेण्ट निष्पादन के समय वादग्रस्त सम्पत्ति बैंक से लोन लिये जाने के कारण, बैंक में बंधक/गिरवी होने एवं इस क्रम में संविदा की विनिर्दिष्ट अनुपालना के क्रम में डिक्री पारित किये जाने को चुनौती दी गई है।
इस क्रम में विचार किया गया। पत्रावली के अवलोकन से प्रकट होता है कि स्वीकृत रूप से सम्पत्ति पर बैंक से लोन लिये जाने एवं सम्पत्ति बैंक में बंधक रखे जाने के बाबत तथ्य एग्रीमेण्ट के समय ही उजागर हो चुका था तथा यह तथ्य एग्रीमेण्ट की रूह से भी स्पष्ट है कि बैंक की ऋण राशि का भुगतान होने के पश्चात आवश्यक औपचारिकतायें पूर्ण होने की स्थिति में विक्रय पत्र निष्पादित होना है। इस क्रम में पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से यह प्रकट होता है कि अधीनस्थ न्यायालय के निर्णय के पूर्व ही बैंक की ऋण राशि का भुगतान किया जा चुका था। ऐसी स्थिति में अधीनस्थ न्यायालय द्वारा संविदा की विनिदिर्ष्ट अनुपालना का दावा डिक्री किये जाने के समय वादग्रस्त सम्पत्ति पर मालिकाना हक न तो बैंक के पास था एवं न ही बैंक की कोई ऋण राशि बकाया थी।
योग्य अधिवक्ता अपीलार्थी-प्रतिवादी ने एग्रीमेण्ट के साथ संलग्न नक्शे पर हस्ताक्षर के बाबत भी ऐतराज उठाया है।
नक्शा एग्रीमेण्ट का भाग होने के क्रम में अधीनस्थ न्यायालय में गवाह परीक्षित हुआ है तथा गवाह ने नक्शे पर ए से बी हस्ताक्षर होने बाबत जो तथ्य प्रकट किया है, उसके साथ-साथ सम्पत्ति का विवरण भी एग्रीमेण्ट में अंकित है।
इस न्यायालय की राय में नक्शा मात्र सम्पत्ति का स्पष्टीकरण/स्थिति उजागर करता है, लेकिन जहॉं सम्पत्ति का विवरण एग्रीमेण्ट में अंकित हो एवं एग्रीमेण्ट के निष्पादन के क्रम में पक्षों की स्वीकृति हो, उस स्थिति में नक्शे पर पक्षकारों के हस्ताक्षर नहीं होने से भी संबंधित सम्पत्ति के एग्रीमेण्ट पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः नक्शे के क्रम में योग्य अधिवक्ता अपीलार्थी-प्रतिवादी द्वारा लिया गया तर्क स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है।
एग्रीमेण्ट की राशि की अदायगी के क्रम में तैयार व तत्परत (ready and willingness) रहने बाबत योग्य अधिवक्ता अपीलार्थी-प्रतिवादी द्वारा न्यायालय के समक्ष रखे गये तर्कों पर मनन करने पर प्रकट होता है कि एग्रीमेण्ट के तहत विक्रय राशि 3,90,000/- रूपये होना बताया गया है एवं सम्पूर्ण राशि का भुगतान भी होना स्वीकृत है। दूसरी ओर वादग्रस्त सम्पत्ति की विक्रय राशि 39,00,000/- रूपये होने के तथ्य को अपीलार्थी-प्रतिवादी द्वारा अपनी साक्ष्य से प्रमाणित नहीं करने की स्थिति में, सम्पूर्ण राशि के भुगतान के क्रम में तैयार व तत्परता (ready and willingness) के क्रम में प्रत्यर्थी-वादी के स्तर पर ऐसा कोई आधार/भार शेष नहीं रहता है, जिसे प्रत्यर्थी-वादी को
प्रमाणित करना आवश्यक हो।
उपरोक्तानुसार विवेचन की रोशनी में अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पारित निर्णय, प्रकरण में उपलब्ध तथ्यात्मक स्थिति एवं साक्ष्य के आधार पर न्यायसंगत होने से उसमें किसी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। अतः प्रस्तुत अपील खारिज किये जाने योग्य है।
परिणामतः अपीलार्थी-प्रतिवादी की ओर से प्रस्तुत यह सिविल प्रथम अपील खारिज की जाती है।
यह निर्णय आज दिनांक 06.12.2018 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348 (i) के तहत भारत सरकार की अधिसूचना राजपत्र संख्या-1, दिनांक 02 जनवरी, 1999 एवं राजस्थान राजपत्र दिनांकित 10.03.1971 के तहत हिन्दी भाषा के प्रयोग को प्राधिकृत किये जाने के परिणामस्वरूप मूल निर्णय हिन्दी भाषा में लिखाया गया। रा.उ.न्या. जोधपुर के आदेश 397/03.10.2018 के तहत अनुवादक से अंग्रेजी भाषा में अनुवाद करवाकर प्रमाणित प्रति भी जारी की जाए।
