AI Structured Summary
Not yet generated for this judgment
Judgment
अपीलार्थीया/वादिया (जिसे आगे ”वादिया” कहा जायेगा) द्वारा यह प्रथम अपील आदेश 41 नियम 1 सपठित धारा 96 सिविल प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत विद्वान अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश क्रम–2, जयपुर जिला जयपुर (जिसे आगे ”विचारण न्यायालय” कहा जायेगा) द्वारा दीवानी वाद संख्या 42/2018 (31/2010), श्रीमती गोमा देवी बनाम लक्ष्मीनारायण व अन्य में पारित निर्णय एवं डिक्री दिनांक 08.02.2019 से व्यथित होकर प्रस्तुत की गयी है, जिसके द्वारा विद्वान विचारण न्यायालय ने अपीलार्थी/वादिया का वाद बाबत घोषणा, स्थायी निषेधाज्ञा एवं विक्रय–पत्र निरस्तीकरण खारिज कर दिया है तथा प्रत्यर्थीगण/प्रतिवादीगण (जिन्हें आगे ”प्रतिवादीगण” कहा जायेगा) को यह आदेश दिया है कि वे आदेश की तिथि से एक माह की अवधि के भीतर 24,00,000/– रुपये न्यायालय में जमा करावें तथा उक्त राशि पर दिनांक 16.05.2009 से निर्णय दिनांक तक 4 प्रतिशत ब्याज भी न्यायालय में जमा करावें तथा यह भी आदेशित किया गया है कि प्रतिवादीगण द्वारा जमा करायी गयी राशि वादिया नियमानुसार प्राप्त करने की अधिकारिणी होगी।
संक्षेप में प्रकरण के तथ्य इस प्रकार हैं कि वादिया ने विद्वान विचारण न्यायालय के समक्ष वादपत्र के पैरा संख्या 1 में वर्णित भूमि के संबंध में प्रतिवादीगण के पक्ष में निष्पादित विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 के प्रतिफल स्वरूप प्रतिवादीगण द्वारा कोई भी राशि अदा नहीं किये जाने तथा उक्त विक्रय–विलेख धोखे से निष्पादित करवाये जाने के आधार पर पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 को शून्य घोषित किये जाने, उक्त भूमि को किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं किये जाने तथा वादिया के कब्जे में हस्तक्षेप नहीं किये जाने के संबंध में प्रतिवादीगण को स्थायी निषेधाज्ञा द्वारा पाबंद किये जाने हेतु वाद प्रस्तुत किया गया।
पक्षकारों के अभिवचनों के आधार पर विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा निम्न विवाद्यक विरचित किये गये:–
“1.आया प्रतिवादीगण ने वादिनी से धोखा, मिसरिप्रेजेन्टेशन कर बिना वादिनी की स्वतंत्र सहमति प्राप्त किए वाद पत्र की मद संख्या–1 में वर्णित कृषि भूमि का विक्रय पत्र बिना प्रतिफल के अपने पक्ष में करवा लिया। अतः विवादित विक्रय पत्र दिनांक 16.04.09 वादिनी अपने अधिकारों के मुकाबले शून्य व बेअसर व निरस्त कराने की अधिकारिणी हैं?
–वादिनी
2.आया वादिया विवादित विक्रय पत्र दिनांक 16.04.2009 के आधार पर प्रतिवादीगण ने आगे जो भी कार्यवाही की है उसे भी शून्य घोषित कराने की अधिकारी है?
–वादिनी
3.आया वादिया विरुद्ध प्रतिवादीगण इस आशय की स्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त करने की अधिकारी है कि प्रतिवादीगण विवादित विक्रय पत्र के आधार पर वादग्रस्त सम्पत्ति का किसी भी तरह से हस्तान्तरण नहीं करें तथा वादिया के कब्जे में किसी प्रकार की बाधा कारित नहीं करें?
–वादिनी
4.आया वादिया ने वादग्रस्त भूमि का विक्रय अनुबंध किसी अन्य व्यक्ति लक्ष्मीनारायण पुत्र जगदीशनारायण शर्मा, निवासी गोनेर के पक्ष में कर रखा था तथा 1100000/– रुपये की राशि भी प्राप्त कर रखी थी?
–प्रतिवादीगण
5.आया प्रतिवादीगण तैयशुदा विक्रय प्रतिफल की राशि 37,20,000/– रुपये में से 13,20,000/– रुपये नकद अदा कर चुके हैं तथा शेष राशि भी सदैव देने हेतु तत्पर है?
–प्रतिवादीगण
6.आया वादिनी ने तथ्यों को छिपाकर स्वयं धोखा देकर रकम हड़पने के आशय से वाद पत्र प्रस्तुत किया है?
–प्रतिवादीगण
7.आया कोर्ट फीस वादिया द्वारा कम अदा की गई है?
–प्रतिवादीगण
8.आया वाद अवधि बाधित है?
–प्रतिवादीगण
9.अनुतोष।”
प्रकरण में वादिया की ओर से पी.डब्ल्यू.–1 गोमा देवी तथा पी.डब्ल्यू.–2 भौंरी लाल के बयान लेखबद्ध करवाये गये तथा दस्तावेजी साक्ष्य में प्रदर्श–1 से प्रदर्श–15 तक दस्तावेज प्रदर्शित करवाये गये। वहीं प्रतिवादीगण की ओर से डी.डब्ल्यू.–1 लक्ष्मीनारायण, डी.डब्ल्यू.–2 छोटीलाल, डी.डब्ल्यू.–3 शंकरलाल डी.डब्ल्यू.–4 ताराशंकर एवं डी.डब्ल्यू.–5 सत्यनारायण के बयान लेखबद्ध करवाये गये तथा दस्तावेजी साक्ष्य में प्रदर्श ए–1 से प्रदर्श ए–58/14 तक दस्तावेज प्रदर्शित करवाये गये।
विद्वान विचारण न्यायालय ने दोनों पक्षों की ओर से प्रस्तुत मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य के मूल्यांकन के पश्चात अपने आलोच्य निर्णय एवं डिक्री दिनांक 08.02.2019 में विवाद्यक संख्या 1 से 6 वादिया के विरुद्ध तथा विवाद्यक संख्या 7 एवं 8 प्रतिवादीगण के विरुद्ध निर्णीत किये। विवाद्यक संख्या 7 एवं 8 के संबंध में प्रतिवादीगण की ओर से कोई क्रॉस ऑब्जेक्शन अथवा अपील प्रस्तुत नहीं की गयी है। ऐसी स्थिति में विवाद्यक संख्या 1 से 6, जो वादिया के विरुद्ध निर्णय किये गये हैं, उनसे व्यथित होकर वादिया की ओर से यह प्रथम अपील प्रस्तुत की गयी है।
वादिया के विद्वान अभिभाषक का बहस के दौरान यह तर्क रहा है कि विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित आलोच्य निर्णय व डिक्री दिनांक 08.02.2019 प्रकरण में प्रस्तुत साक्ष्यों व दस्तावेजों का सही रूप से विवेचन नहीं कर प्रकरण विधि–विरुद्ध तरीके से निर्णीत किया गया है। वादिया द्वारा वादग्रस्त संपत्ति के संबंध में जो पंजीकृत विक्रय–पत्र प्रतिवादीगण के पक्ष में दिनांक 16.04.2009 को निष्पादित किया गया था, उक्त विक्रय–पत्र में प्रतिवादीगण द्वारा वादग्रस्त संपत्ति के विक्रय प्रतिफल के भुगतान की राशि चैक द्वारा अदा किये जाने का उल्लेख किया गया तथा इस संबंध में वादिया की ओर से चैक प्राप्त कर लिये गये। वादिया गांव की अनपढ़ महिला है, उसने प्रतिवादीगण के विश्वास में आकर विक्रय–पत्र दिनांक 16.04.2009 पंजीकृत करवा लिया, लेकिन विक्रय प्रतिफल के भुगतान हेतु दिये गये चैकों की राशि का भुगतान आज दिनांक तक वादिया को प्राप्त नहीं हुआ है। वादग्रस्त भूखंड का प्रतिफल अदा किये बिना प्रतिवादीगण ने कपटपूर्वक वादिया को धोखे में रखकर पंजीकृत विक्रय–पत्र निष्पादित करवा लिया और कब्जा प्राप्त कर लिया तथा इसके अनुसार वादग्रस्त भूखंड अपने नाम राजस्व अभिलेखों में अंकित करवा लिया। भूखंड के विक्रय प्रतिफल की राशि अदा नहीं किये जाने के कारण दोनों पक्षों के मध्य संविदा पूर्ण नहीं हुई है तथा प्रतिफल के अभाव में यह माना जायेगा कि वादिया द्वारा पंजीकृत विक्रय–पत्र प्रतिवादीगण के पक्ष में निष्पादित नहीं किया गया है। ऐसी स्थिति में विद्वान विचारण न्यायालय को पंजीकृत विक्रय–पत्र दिनांक 16.04.2009 को भूखंड का प्रतिफल प्रतिवादीगण द्वारा अदा नहीं किये जाने के आधार पर निरस्त करना चाहिए था, जबकि विचारण न्यायालय ने उक्त विक्रय–पत्र निरस्त नहीं कर वादिया को प्रतिवादीगण से विक्रय–पत्र में अंकित राशि पर ब्याज अदा किये जाने का विधि–विरुद्ध निर्णय पारित कर दिया है।
वादिया के विद्वान अभिभाषक का यह भी तर्क रहा है कि पंजीकृत विक्रय–पत्र दिनांक 16.04.2009 में अंकित चैक प्रतिवादीगण द्वारा वादिया को दिये गये थे, किन्तु उक्त चैकों के संबंध में प्रतिवादीगण ने बाद में बदनीयतिपूर्वक “स्टॉप पेमेंट” करवा दिया तथा चैकों की राशि का भुगतान नहीं किया। इस संबंध में चैकों की राशि अदा किये जाने हेतु वादिया ने प्रतिवादीगण को दिनांक 24.12.2009 को नोटिस भी दिया, किन्तु इसके बावजूद भी प्रतिवादीगण ने वादग्रस्त भूखंड के विक्रय प्रतिफल की कोई राशि अदा नहीं की, जिस कारण वादिया की ओर से यह वाद संस्थित किया गया। प्रतिवादीगण वादग्रस्त भूखंड के प्रतिफल के रूप में कोई भी राशि दिये बिना वादग्रस्त भूखंड का उपयोग एवं उपभोग कर रहे हैं तथा उक्त विक्रय–पत्र वैध संविदा की परिभाषा में नहीं आता है। ऐसी स्थिति में विद्वान विचारण न्यायालय को विक्रय–पत्र दिनांक 16.04.2009 को निरस्त करना चाहिए था। इसके बावजूद भी विद्वान विचारण न्यायालय ने विक्रय–पत्र दिनांक 16.04.2009 को निरस्त नहीं कर विधि में प्रतिपादित सिद्धांतों के विपरीत आलोच्य निर्णय व डिक्री पारित की है।
वादिया के विद्वान अभिभाषक का बहस के दौरान यह भी तर्क रहा है कि प्रतिवादीगण ने विक्रय–विलेख में अंकित चैकों की राशि का भुगतान जानबूझकर एवं बदनीयतिपूर्वक रोक दिया, जिससे भूखंड के प्रतिफल की राशि वादिया को प्राप्त नहीं हो सके। प्रतिवादीगण की बदनीयति इसी तथ्य से स्पष्ट होती है कि वादिया ने प्रतिवादीगण को वादग्रस्त भूखंड के प्रतिफल के एवज में राशि दिये जाने हेतु नोटिस द्वारा राशि की मांग की थी, उसके बावजूद भी प्रतिवादीगण ने प्रतिफल की राशि अदा नहीं की। प्रतिवादीगण द्वारा चैक अनादरित करवाने के संबंध में वादिया की ओर से धारा 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम के अन्तर्गत परिवाद सक्षम न्यायालय में प्रस्तुत किया गया तथा प्रतिवादीगण को वादग्रस्त भूखंड के विक्रय प्रतिफल की राशि का भुगतान नहीं करना पड़े, इस उद्देश्य से लक्ष्मीनारायण नामक व्यक्ति के पक्ष में वादग्रस्त भूखंड का विक्रय किये जाने के संबंध में एक फर्जी इकरारनामा दिनांक 07.02.2009 को निष्पादित करवा दिया, जिस पर वादिया के हस्ताक्षर नहीं हैं। इस संबंध में वादिया द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 323/2009 अन्तर्गत धारा 420, 467, 468, 406 एवं 120–बी भारतीय दण्ड संहिता, पुलिस थाना शिवदासपुरा, जयपुर में प्रतिवादीगण के विरुद्ध दर्ज करवायी गयी। जिन अधिवक्ताओं ने प्रतिवादीगण से मिलीभगत कर उक्त फर्जी दस्तावेज तैयार किया, उन अधिवक्ताओं के विरुद्ध भी वादिया ने बार काउंसिल ऑफ राजस्थान में शिकायत प्रस्तुत की। प्रतिवादीगण ने वादग्रस्त भूखंड के विक्रय के प्रतिफल स्वरूप न तो वादिया को और न ही वादिया के पुत्रों को कोई राशि अदा की है। उक्त राशि प्रतिवादीगण द्वारा जानबूझकर अदा नहीं किये जाने, अर्थात् विक्रय प्रतिफल का भुगतान नहीं किये जाने के कारण, पंजीकृत विक्रय–विलेख प्रतिफल के अभाव में शून्य एवं प्रभावहीन है तथा विधि की दृष्टि में उसका कोई महत्व नहीं है। अतः अपीलार्थी/वादिया की अपील स्वीकार की जाकर विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित आलोच्य निर्णय एवं डिक्री दिनांक 08.02.2019 को अपास्त किया जावे तथा पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 को प्रतिफल के अभाव में शून्य, प्रभावहीन एवं निरस्त घोषित किया जावे।
प्रतिवादीगण के विद्वान अभिभाषक का बहस के दौरान यह तर्क रहा है कि वादिया ने पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 के द्वारा विक्रय–विलेख में अंकित संपत्ति प्रतिवादीगण को विक्रय की थी तथा उसके भुगतान के एवज में प्रतिवादीगण ने चैक वादिया को दिये थे, जिनका उल्लेख पंजीकृत विक्रय–विलेख में किया गया है। प्रतिवादीगण को जब यह पता चला कि वादग्रस्त भूमि के संबंध में वादिया ने विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 से पूर्व किसी लक्ष्मीनारायण पुत्र श्री जगदीश नारायण शर्मा को उक्त भूमि विक्रय कर दी है, तब प्रतिवादीगण को इस तथ्य का ज्ञान दिनांक 12.05.2009 को पुलिस थाना शिवदासपुरा से फोन आने पर प्रतिवादी लक्ष्मीनारायण को बुलाये जाने पर हुआ। पुलिस द्वारा यह बताया गया कि वादिया ने दिनांक 07.02.2009 को लक्ष्मीनारायण के साथ वादग्रस्त भूखंड का विक्रय–अनुबंध कर 11,00,000/– रुपये प्राप्त कर लिये हैं। इस संबंध में लक्ष्मीनारायण द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 135/2009 पुलिस थाना शिवदासपुरा में दर्ज करवायी गयी। इस तथ्य का ज्ञान होने पर प्रतिवादीगण ने वादिया को दिनांक 30.05.2009 को इस आशय का नोटिस दिया कि वह लक्ष्मीनारायण के साथ दिनांक 07.02.2009 को वादग्रस्त भूमि का विक्रय–इकरार करने के संबंध में अपनी स्थिति स्पष्ट करे। इसके पश्चात प्रतिवादीगण ने दिनांक 11.11.2009 एवं 11.12.2009 को भी वादिया को नोटिस दिये। जब वादिया द्वारा कोई समुचित जवाब नहीं दिया गया, तब प्रतिवादीगण ने संबंधित बैंक को समस्त तथ्यों का उल्लेख करते हुये विक्रय–विलेख के साथ दिये गये चैकों का भुगतान वादिया को नहीं किये जाने के संबंध में दिनांक 16.05.2009 को पत्र प्रेषित कर दिया। ऐसी स्थिति में भूखंड के विक्रय प्रतिफल स्वरूप दिये गये चैकों की राशि को रोकने का प्रतिवादीगण का कोई बदनीयतिपूर्वक उद्देश्य नहीं था तथा न ही वादिया को धोखा देने का उद्देश्य था। यदि प्रतिवादीगण का वादिया को भूखंड के प्रतिफल स्वरूप कोई राशि नहीं देने का उद्देश्य होता, तो वे बिना किसी न्यायोचित आधार के चैकों की राशि को अनादरित करवा देते, किन्तु इस प्रकरण में ऐसी स्थिति नहीं है। भूखंड के विक्रय प्रतिफल के भुगतान को रोकने का कोई बदनीयतिपूर्वक उद्देश्य प्रतिवादीगण का था, यह स्पष्ट नहीं है। वादिया द्वारा वादग्रस्त भूखंड का विक्रय–इकरार लक्ष्मीनारायण के साथ प्रतिवादीगण के पक्ष में उपरोक्त विक्रय–विलेख निष्पादित किये जाने से पूर्व किया गया था। इस संबंध में लक्ष्मीनारायण ने वादिया के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 135/2009 पुलिस थाना शिवदासपुरा में दर्ज करवायी, जिसमें पुलिस ने वादिया के विरुद्ध धारा 406 व 420 भारतीय दण्ड संहिता के आरोप प्रमाणित पाये तथा उसके विरुद्ध आरोप–पत्र प्रस्तुत किया। इस प्रकरण में माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा वादिया की अग्रिम जमानत भी खारिज की गयी थी, जिसे बाद में माननीय उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार किया। वहीं वादिया की ओर से जो प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 323/2009 दर्ज करवायी गयी थी, उसमें पुलिस ने अपराध घटित होना नहीं मानते हुये अंतिम रिपोर्ट संख्या 280/2014 अदम वकू आदतन झूठ प्रस्तुत की है। प्रतिवादीगण ने वादिया को वादग्रस्त भूखंड के एवज में नगद राशि भी वादिया के पुत्र भौंरी लाल को दी थी। इस तथ्य का उल्लेख प्रदर्श ए–6 विक्रय–विलेख के अंतिम पृष्ठ की पुश्त पर किया गया है, जिसके अनुसार दो गवाहों की उपस्थिति में वादिया के पुत्र भौंरी लाल को भूखंड के एवज में 8,50,000/– रुपये का भुगतान किया गया था। वादिया एवं भौंरी लाल ने अपने बयानों में इस तथ्य को स्वीकार किया है कि भौंरी लाल ही वादिया के समस्त कार्यों को देखता था तथा भौंरी लाल ने वादिया की ओर से उक्त राशि प्राप्त की थी। इसके अतिरिक्त प्रतिवादी लक्ष्मीनारायण द्वारा वादिया को दिनांक 25.04.2009 को जो चैक दिया गया था, उसकी पुश्त पर 4,70,000/– रुपये प्राप्त करने का अंकन रामावतार शर्मा का है, जो वादिया का पुत्र है। ऐसी स्थिति में यह नहीं माना जा सकता कि प्रतिवादीगण ने वादिया को भूखंड के प्रतिफल स्वरूप कोई राशि अदा नहीं की हो। प्रतिवादीगण वादग्रस्त भूखंड की राशि अदा करने के लिये सदैव तैयार एवं तत्पर रहे हैं। विक्रय प्रतिफल स्वरूप राशि अदा किये जाने तथा चैकों की राशि को बदनीयतिपूर्वक नहीं रोके जाने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि दोनों पक्षों के मध्य कोई संविदा नहीं हुई हो अथवा वादग्रस्त भूमि का विक्रय नहीं हुआ हो। वादिया तथा प्रतिवादीगण द्वारा प्रस्तुत मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य के अवलोकन के पश्चात विद्वान विचारण न्यायालय ने विधि अनुसार आलोच्य निर्णय एवं डिक्री पारित की है, जिसमें हस्तक्षेप किये जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। अतः वादिया की ओर से प्रस्तुत यह अपील अस्वीकार कर खारिज की जावे।
प्रतिवादीगण के विद्वान अभिभाषक ने अपने तर्कों के समर्थन में निम्न विनिश्चय प्रस्तुत किये:–
Dahiben Vs. Arvindbhai Kalyanji Bhanusali (Gajra) (D) Thr. LR's & Ors.; AIR 2020 SC 3310
Kaliaperumal Vs. Rajagopal & Anr.; (2009) 4 SCC 193
Vidhyadhar Vs. Manikrao & Anr.; (1999) 3 SCC 573
Basanti Mohanty Vs. Brahmanand Das & Ors.; AIR 1996 Orissa 86
Kutcherlakota Vijayalakshmi Vs. Radimeti Rajaratnamba & Ors.; AIR 1991 Andhra Pradesh 50
Gurubari Lenka & Anr. Vs. Dulani Thakurani & Ors. AIR 1971 Orissa 147
वादिया की ओर से यह अपील विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित आलोच्य निर्णय व डिक्री दिनांक 08.02.2019 के विरुद्ध प्रस्तुत की गयी है, जिस आदेश के द्वारा विद्वान विचारण न्यायालय ने विवाद्यक संख्या 1 से 6 वादिया के विरुद्ध निर्णीत किये हैं। उक्त सभी विवाद्यक एक–दूसरे से संबंधित होने के कारण, सुविधा की दृष्टि से उक्त सभी विवाद्यकों के संबंध में विवेचन एक साथ किया जा रहा है।
इस प्रकरण में यह स्वीकृत स्थिति है कि प्रदर्श–5 पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 के द्वारा वादिया ने प्रतिवादीगण को वादपत्र के पैरा संख्या 1 में वर्णित भूमि 24 लाख रुपये में प्रतिवादीगण को विक्रय करने का इकरार किया और विक्रय–विलेख की संपूर्ण धनराशि विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 में अंकित चैकों के माध्यम से वादिया को अदा कर दी, जिसे वादिया ने प्राप्त कर लिया। इस आधार पर वादिया ने पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 प्रतिवादीगण के पक्ष में निष्पादित करके उक्त विक्रय–विलेख में यह उल्लेखित किया कि:–
“अब विक्रय मूल्य की संपूर्ण धनराशि विक्रेती को उक्त क्रेतागण से कुछ भी लेना शेष नहीं रही है। विक्रय गयी भूमि पर विक्रेती ने अपना समस्त दखल व कब्जा हटाकर मौके पर वास्तविक कब्जा उक्त क्रेतागण को सौंप दिया गया है, जिससे क्रेतागण उक्त भूमि पर एकमात्र स्थायी स्वामी व मालिक के रूप में काबिज हो गये हैं।”
उक्त विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 में यह भी उल्लेखित किया गया है कि:–
“विक्रय की गयी कृषि भूमि आराजी कुल किता दो, कुल रकबा 1.00 हेक्टेयर, संपूर्ण का विक्रेती द्वारा नियमानुसार राजस्व विभाग में नामान्तकरण उक्त क्रेतागण के हक में खुलवा दिया जायेगा, अन्यथा क्रेतागण इस लेख्य पत्र के आधार पर विक्रय की गयी भूमि का नामान्तकरण राजस्व विभाग से अपने नाम से खुलवाने के लिये पूर्णतया स्वतंत्र रहेंगे। विक्रय की गयी भूमि पर विक्रेती ने उक्त क्रेतागण को एकमात्र स्थायी स्वामी व मालिक के रूप में काबिज कर दिया है, जिससे क्रेतागण उक्त भूमि को हर प्रकार से उपयोग व उपभोग कर लाभ अर्जित करने के लिये पूर्णतया स्वतंत्र रहेंगे।”
उक्त पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 पक्षकारों एवं साक्षी भौंरी लाल, जो कि वादिया का पुत्र है, तथा एक अन्य साक्षी छोटीलाल शर्मा की उपस्थिति में निष्पादित हुआ। उक्त पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 फर्जी या बनावटी हो अथवा उक्त विक्रय–विलेख पर वादिया के हस्ताक्षर नहीं हों, इस प्रकार का कोई अभिवचन वादिया का नहीं रहा है। ऐसी स्थिति में यह स्वीकृत स्थिति है कि प्रदर्श–5 पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 दोनों पक्षों के मध्य निष्पादित हुआ तथा उक्त वादग्रस्त भूखंड के विक्रय के प्रतिफल स्वरूप 24 लाख रुपये देना तय हुआ तथा इस संबंध में चैक प्रतिवादीगण द्वारा वादिया को दिये गये। इस पर वादिया ने प्रतिवादीगण को भूखंड का वास्तविक कब्जा सौंप दिया तथा भूखंड के राजस्व अभिलेखों में इन्द्राज करवाने का अधिकार दे दिया। उक्त अधिकार के तहत वादग्रस्त भूखंड वर्तमान में प्रतिवादीगण के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज हो चुका है, यह तथ्य भी पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत की गयी मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य से स्वीकृत है।
अब जहां तक वादग्रस्त भूखंड के संबंध में प्रतिवादीगण द्वारा वादिया को चैकों की राशि का भुगतान नहीं किये जाने के आधार पर दोनों पक्षों के मध्य निष्पादित पंजीकृत विक्रय–विलेख के विधि की दृष्टि से शून्य व प्रभावहीन होने का प्रश्न है अथवा दोनों पक्षों के मध्य संविदा प्रतिफल के अभाव में नहीं मानी जाने तथा वादग्रस्त भूखंड का विक्रय नहीं किये जाने का प्रश्न है, तो यहां यह कहना न्यायोचित होगा कि वादिया ने प्रतिवादीगण के पक्ष में प्रदर्श–5 पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 निष्पादित किये जाने से पूर्व दिनांक 07.02.2009 को वादग्रस्त भूखंड के संबंध में एक इकरारनामा प्रदर्श ए–7 निष्पादित कर दिया था। उक्त इकरारनामे के आधार पर वादिया ने वादग्रस्त भूखंड घरेलू आवश्यकता के लिये लक्ष्मीनारायण पुत्र श्री जगदीश नारायण शर्मा को विक्रय करने का इकरार कुल 22 लाख रुपये में किया तथा 11 लाख रुपये सांई पेटे प्राप्त कर लिये। उक्त विक्रय इकरारनामे पर साक्षीगण सत्यनारायण शर्मा व जगदीश नारायण शर्मा आदि के हस्ताक्षर/अंगूठा निशानी है। उक्त इकरारनामा प्रदर्श ए–7 की पालना में वादिया द्वारा लक्ष्मीनारायण शर्मा के हक में वादग्रस्त भूखंड का पंजीकृत विक्रय–विलेख निष्पादित नहीं किये जाने के संबंध में लक्ष्मीनारायण शर्मा द्वारा प्रदर्श ए–8 रजिस्टर्ड नोटिस दिनांक 15.05.2009 को वादिया को दिया गया तथा लक्ष्मीनारायण ने एक प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 135/2009 वादिया के विरुद्ध पुलिस थाना शिवदासपुरा में दर्ज करवायी एवं उसने वादिया के विरुद्ध वादग्रस्त भूखंड का पंजीकृत विक्रय–विलेख निष्पादित किये जाने के संबंध में उसके पक्ष में निष्पादित इकरारनामे की संविदा की विनिर्दिष्ट पालना, आज्ञापक एवं स्थायी निषेधाज्ञा का वाद विद्वान जिला एवं सेशन न्यायाधीश, जयपुर महानगर, जयपुर के न्यायालय में प्रस्तुत किया, जो वर्तमान में लंबित होना बताया गया है। लक्ष्मीनारायण द्वारा दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 135/2009 में अनुसंधान कर पुलिस ने यह पाया कि विक्रय रसीद पर वादिया की अंगूठा निशानी फर्जी नहीं है तथा अधिवक्ता गोपाललाल शर्मा ने खाली कागजातों पर वादिया की अंगूठा निशानी लगवाकर लक्ष्मीनारायण को नहीं दिये हैं और गवाहों से मिलकर कोई फर्जी व कूटरचित इकरारनामा तैयार नहीं किया गया है। जिस इकरारनामे एवं रसीद के माध्यम से वादग्रस्त भूखंड को विक्रय करने के संबंध में वादिया ने लक्ष्मीनारायण से इकरार किया, उस पर वादिया की फर्जी अंगूठा निशानी है, यह तथ्य भी विधि विज्ञान प्रयोगशाला की रिपोर्ट में सामने नहीं आया है। अनुसंधान में पुलिस ने यह पाया कि वादिया ने वादग्रस्त भूमि के संबंध में इकरारनामा लक्ष्मीनारायण के पक्ष में निष्पादित किया था तथा उक्त इकरारनामा वादिया का पुत्र भौंरी लाल तैयार करवाकर लाया था तथा भूखंड के विक्रय के बयाने स्वरूप 11 लाख रुपये प्राप्त कर लिये थे। इसके पश्चात वादिया ने वादग्रस्त खातेदारी कृषि भूमि के संबंध में विक्रय–विलेख प्रतिवादीगण के पक्ष में निष्पादित कर दिनांक 16.04.2009 को विक्रय–विलेख पंजीबद्ध करवा दिया। पुलिस ने वादिया के विरुद्ध धारा 420, 406 एवं 120–बी भारतीय दण्ड संहिता के आरोप प्रमाणित मानकर आरोप–पत्र संख्या 231/2014 सक्षम न्यायालय में प्रस्तुत किया।
इस प्रकरण में वादिया की ओर से प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 323/2009 पुलिस थाना शिवदासपुरा में दिनांक 15.10.2009 को दर्ज करवायी गयी है, जो लक्ष्मीनारायण द्वारा दर्ज करवायी गयी प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 135/2009 दिनांक 12.05.2009 के पश्चात प्रस्तुत की गयी है। ऐसी स्थिति में यह प्रथम दृष्टया स्पष्ट होता है कि वादिया ने लक्ष्मीनारायण द्वारा प्रदर्श ए–14 प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 135/2009 उसके विरुद्ध प्रस्तुत होने के पश्चात प्रदर्श–15 द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 323/2009 दिनांक 15.10.2009 को दर्ज करवायी है। वादिया द्वारा प्रस्तुत प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 323/2009 में वादिया ने फर्जी विक्रय इकरारनामा लिखने तथा फर्जी अंगूठा निशानी होना बताया है। इस संबंध में पुलिस ने अनुसंधान कर अंतिम रिपोर्ट संख्या 280/2014 अदम वकू आदतन झूठ में प्रस्तुत कर दी तथा यह माना कि वादिया ने इकरारनामे के द्वारा लक्ष्मीनारायण को वादग्रस्त भूखंड का विक्रय कर 11 लाख रुपये प्राप्त कर लिये तथा लक्ष्मीनारायण के पक्ष में पंजीकृत विक्रय–विलेख निष्पादित नहीं कर प्रतिवादीगण के पक्ष में पंजीकृत विक्रय–विलेख निष्पादित कर दिया। इस प्रकार स्वयं पुलिस ने भी यह नहीं पाया कि वादिया ने लक्ष्मीनारायण के साथ वादग्रस्त भूखंड विक्रय करने का जो इकरार किया था, वह फर्जी व बनावटी था। जब प्रतिवादीगण को इस तथ्य का पता चला कि लक्ष्मीनारायण द्वारा वादिया के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 135/2009 दर्ज करवायी गयी है तथा इस बाबत पुलिस थाना शिवदासपुरा में उन्हें बुलाकर पूछताछ की गयी, तब प्रतिवादीगण ने वादिया को दिनांक 11.11.2009 एवं 11.12.2009 को नोटिस दिये। प्रतिवादीगण ने वादिया द्वारा प्रदर्श ए–8 नोटिस दिनांक 24.12.2009 के जवाब में प्रदर्श ए–13 दिनांक 12.01.2010 प्रस्तुत किया, जिसमें भी प्रतिवादीगण द्वारा यह सूचित किया गया कि उन्होंने रजिस्टर्ड नोटिस द्वारा वादिया को दिनांक 16.05.2009 व 30.05.2009 को ही सूचित कर दिया था कि वादग्रस्त भूखंड को लक्ष्मीनारायण को विक्रय करने के अनुबंध के कारण विवाद उत्पन्न हो रहा है तथा इसकी जांच–पड़ताल की जा रही है, अतः उक्त विवाद का समाधान करावे। प्रतिवादीगण ने वादिया को दिनांक 11.11.2009 को जो नोटिस दिया, उसके नोटिस का जवाब वादिया ने प्रदर्श–14 के माध्यम से दिनांक 24.11.2009 को दिया, जिसमें उसके द्वारा भूमि प्रतिवादीगण को विक्रय करने का कोई इकरार नहीं किया जाना बताया गया तथा चैक का भुगतान उसे किये जाने का आग्रह किया गया है। प्रतिवादीगण ने वादिया को दिनांक 30.05.2009 को प्रदर्श ए–11 एवं दिनांक 11.12.2009 को प्रदर्श ए–23 नोटिस दिया, जिसकी प्रति प्रस्तुत हुई है। वादिया द्वारा प्रतिवादीगण के नोटिस दिनांक 24.11.2009 के जवाब दिनांक 12.01.2010 को प्रतिवादीगण को प्रेषित किये जाने के संबंध में भी जवाब की प्रति प्रदर्श ए–28 इस प्रकरण में प्रदर्शित हुई है। प्रदर्श–5 पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 में अंकित चैकों का भुगतान नहीं किये जाने के संबंध में प्रतिवादीगण ने दिनांक 16.05.2009 को एक पत्र यूको बैंक को दिया था, जो दिनांक 16.05.2009 को ही बैंक में प्राप्त हो गया, जिसके आधार पर बैंक द्वारा चैक अनादरित कर दिये गये। उक्त पत्र में अभिलिखित किया गया है कि प्रतिवादीगण ने चैकों का भुगतान रोकने की सूचना रजिस्टर्ड नोटिस द्वारा श्रीमती गोमा देवी वादिया को दे दी है तथा वादिया द्वारा विक्रय की गयी भूमि में विवाद उत्पन्न होने एवं वादिया द्वारा जमीन को दो बार बेचने के संबंध में मुकदमा दर्ज होने के कारण चैकों का भुगतान वादिया को नहीं किया जावे।
ऐसी स्थिति में इस स्तर पर दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत की गयी मौखिक व दस्तावेजी साक्ष्य का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि वादिया द्वारा प्रतिवादीगण के पक्ष में वादग्रस्त भूमि का पंजीकृत विक्रय–विलेख प्रदर्श–5 दिनांक 16.04.2009 को निष्पादित किये जाने से पूर्व वादिया ने वादग्रस्त भूखंड का इकरारनामा/रसीद प्रदर्श ए–7 दिनांक 07.02.2009 को निष्पादित कर दी थी। प्रदर्श ए–7 इकरारनामा/रसीद फर्जी व बनावटी है अथवा उस पर वादिया के हस्ताक्षर/अंगूठा निशानी नहीं है, यह तथ्य वादिया द्वारा दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट में पुलिस द्वारा किये गये अनुसंधान से स्पष्ट नहीं हुआ है तथा पुलिस ने वादिया द्वारा प्रस्तुत प्रथम सूचना रिपोर्ट में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की है। जबकि लक्ष्मीनारायण द्वारा जो प्रथम सूचना रिपोर्ट वादिया के विरुद्ध दर्ज करवायी गयी थी, उसमें पुलिस ने वादिया के विरुद्ध धारा 406 एवं 420 भारतीय दण्ड संहिता का अपराध प्रमाणित पाया है तथा इस प्रकरण में वादिया की अग्रिम जमानत माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वीकार की गयी है तथा इस प्रकरण में वादिया के विरुद्ध आरोप–पत्र भी प्रस्तुत किया गया है। वादिया द्वारा प्रतिवादीगण को वादग्रस्त भूखंड का विक्रय किये जाने से पूर्व उक्त भूखंड का विक्रय इकरारनामा लक्ष्मीनारायण के पक्ष में किये जाने के प्रतिफल स्वरूप 11 लाख रुपये की राशि प्राप्त किये जाने तथा लक्ष्मीनारायण द्वारा वादिया के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट पुलिस थाना शिवदासपुरा में दर्ज किये जाने की सूचना प्रतिवादीगण को होने के आधार पर प्रतिवादीगण द्वारा वादिया को नोटिस दिये जाने एवं तत्पश्चात वादिया को दिये गये चैक अनादरित किये जाने के आधार पर इस स्तर पर यह नहीं माना जा सकता कि वादग्रस्त भूखंड की राशि अदा नहीं किये जाने में प्रतिवादीगण की बदनीयती थी।
इस प्रकरण में प्रदर्श ए–6 विक्रय इकरारनामा प्रदर्शित हुआ है, जिसके पृष्ठ संख्या 3 की पुश्त पर वादग्रस्त भूखंड के संबंध में 8,50,000/– रुपये वादिया के पुत्र भौंरी लाल द्वारा प्राप्त किये जाने का सी से डी अंकन होना तथा ए से बी भौंरी लाल के हस्ताक्षर होना बताया गया है। वादिया की जगह उसका पुत्र भौंरी लाल समस्त कार्य करता था, इस तथ्य का कथन वादिया पी.डब्ल्यू.–1 तथा उसके पुत्र भौंरी लाल पी.डब्ल्यू.–2 ने अपने बयानों में किया है। उक्त इबारत पर गवाह के रूप में छोटीलाल के हस्ताक्षर नहीं हों, यह प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर इस स्तर पर नहीं माना जा सकता है। प्रतिवादीगण की ओर से डी.डब्ल्यू.–2 छोटीलाल एवं डी.डब्ल्यू.–4 शंकरलाल परीक्षित हुये हैं, जो कि उक्त रसीद के साक्षी हैं। ऐसी स्थिति में वादिया की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उसके पुत्र भौंरी लाल ने उक्त भूखंड के विक्रय प्रतिफल स्वरूप कोई राशि प्राप्त नहीं की हो।
इस प्रकरण में प्रदर्श ए–3 प्रतिवादी लक्ष्मीनारायण द्वारा वादिया गोमा देवी को प्रेषित चैक दिनांक 25.04.2009 की प्रति प्रस्तुत की गयी है तथा उसकी पुश्त पर वादिया के पुत्र रामअवतार शर्मा के हस्ताक्षर होना बताया गया है, किन्तु उसकी पुश्त पर कुल कितने रुपये रामअवतार शर्मा ने प्राप्त किये, यह स्पष्ट नहीं है। उक्त रुपये रामअवतार शर्मा ने प्राप्त किये या नहीं, इस संबंध में वह इस प्रकरण में परीक्षित नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह नहीं माना जा सकता है कि वादिया को भूखंड के प्रतिफल स्वरूप कोई राशि प्राप्त नहीं हुई हो अथवा भूखंड के विक्रय प्रतिफल स्वरूप राशि नहीं देने का प्रतिवादीगण का कोई बदनीयतिपूर्वक उद्देश्य रहा हो। प्रदर्श–5 विक्रय–विलेख में यह भी उल्लेखित नहीं किया गया है कि पंजीकृत विक्रय–विलेख दिनांक 16.04.2009 में उल्लिखित चैकों की राशि का भुगतान नियत तिथि तक अथवा किसी भी स्थिति में नहीं होने पर उक्त पंजीकृत विक्रय–विलेख निरस्त अथवा प्रभावशून्य माना जायेगा। वादिया ने प्रतिफल स्वरूप चैकों की राशि प्राप्त नहीं की, इस प्रकार का कोई अंकन भी नहीं किया है तथा संपूर्ण भूखंड के विक्रय प्रतिफल स्वरूप चैकों के रूप में संपूर्ण राशि प्राप्त कर कब्जा प्रतिवादीगण को दे दिया तथा उक्त भूखंड का राजस्व अभिलेखों में इन्द्राज करवाने का अधिकार भी दे दिया, जिस इन्द्राज के आधार पर प्रतिवादीगण ने राजस्व अभिलेखों में अपना नाम इन्द्राज करवा लिया। प्रतिवादीगण ने कब्जा लेने के पश्चात प्रदर्श ए–34 के अनुसार अपनी भूमि को पांचूराम को काश्त हेतु कब्जे में देकर रुपये प्राप्ति रसीद निष्पादित करवायी, जिस पर छोटीलाल शर्मा एवं घनश्याम शर्मा के हस्ताक्षर किये गये। इस तथ्य का कथन प्रतिवादीगण द्वारा प्रस्तुत साक्षीगण ने अपने बयानों में किया है।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने विभिन्न विनिश्चयों में यह अभिनिर्धारित किया है कि जहाँ पंजीकृत विक्रय–विलेख निष्पादित हुआ हो और उसके प्रतिफल स्वरूप राशि पूर्णतया या आंशिक रूप से प्राप्त कर ली गयी हो, तो ऐसी स्थिति में पंजीकृत विक्रय–विलेख को निरस्त नहीं किया जा सकता है तथा विक्रय–विलेख में अंकित विक्रय–प्रतिफल राशि को विक्रेता प्राप्त करने का अधिकारी हो सकता है। इस संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित विनिश्चय Dahiben v. Arvindbhai Kalyanji Bhanusali (2020) 7 SCC 366 में यह मत व्यक्त किया गया है कि:–
"29.8.In Vidhyadhar v. Manikrao [Vidhyadhar v. Manikrao, (1999) 3 SCC 573] this Court held that the words “price paid or promised or part-paid and part-promised” indicates that actual payment of the whole of the price at the time of the execution of the sale deed is not a sine qua non for completion of the sale. Even if the whole of the price is not paid, but the document is executed, and thereafter registered, the sale would be complete, and the title would pass on to the transferee under the transaction. The non-payment of a part of the sale price would not affect the validity of the sale. Once the title in the property has already passed, even if the balance sale consideration is not paid, the sale could not be invalidated on this ground. In order to constitute a “sale”, the parties must intend to transfer the ownership of the property, on the agreement to pay the price either in praesenti, or in future. The intention is to be gathered from the recitals of the sale deed, the conduct of the parties, and the evidence on record".
इसी प्रकार का मत माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा विनिश्चय Kaliaperumal v. Rajagopal, (2009) 4 SCC 193 में व्यक्त किया गया है, जिसका सुसंगत भाग निम्नानुसार है:–
"17.It is now well settled that payment of entire price is not a condition precedent for completion of the sale by passing of title, as Section 54 of the Transfer of Property Act, 1882 (“the Act”, for short) defines “sale” as “a transfer of ownership in exchange for a price paid or promised or part-paid and part-promised”. If the intention of parties was that title should pass on execution and registration, title would pass to the purchaser even if the sale price or part thereof is not paid. In the event of non-payment of price (or balance price as the case may be) thereafter, the remedy of the vendor is only to sue for the balance price. He cannot avoid the sale. He is, however, entitled to a charge upon the property for the unpaid part of the sale price where the ownership of the property has passed to the buyer before payment of the entire price, under Section 55(4)(b) of the Act".
इसी क्रम में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने नवीनतम विनिश्चय Raziya Begum & Ors. Vs. Nafisa Begum Abdul Hamid & Ors; 2026 INSC 814 में पारित निर्णय दिनांक 07.08.2026 में यह मत व्यक्त किया है कि:–
11.Dahiben (supra) also, while interpreting Section 54 of the Act, held that actual payment of entire sale price at the time of execution of sale deed is not an essential condition for completion of sale. When a sale deed is registered, even upon part payment of the sale price, title would pass to the transferee. The nonpayment of remaining part of the sale price would not invalidate it and the remedy would be to recover the balance sale consideration, but not cancellation of sale deed for non-payment of balance sale consideration
अतः उपरोक्त विनिश्चयों में अभिनिर्धारित सिद्धांतों तथा उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह स्पष्ट है कि वादिया ने प्रतिवादीगण को प्रदर्श–5 पंजीकृत विक्रय–विलेख के माध्यम से वादग्रस्त भूखंड का विक्रय कर प्रतिफल राशि स्वरूप चैक के रूप में प्राप्त कर, कब्जा प्रतिवादीगण को दे दिया तथा राजस्व अभिलेख में उसका इन्द्राज करवाने का अधिकार भी दे दिया, जिसके आधार पर प्रतिवादीगण ने राजस्व अभिलेख में अपना इन्द्राज करवा लिया तथा अपनी भूमि को काश्त के लिए पांचूराम को दे दिया। वर्तमान समय में प्रतिवादीगण का वादग्रस्त भूमि पर कब्जा है।
विद्वान विचारण न्यायालय ने विवाद्यक संख्या 1 से 6 का विस्तृत विवेचन अपने आलोच्य निर्णय व डिक्री दिनांक 08.02.2019 में किया है, जिसकी यहाँ पुनरावृत्ति किया जाना न्यायोचित प्रतीत नहीं होता है। मेरे विनम्र मत में विद्वान विचारण न्यायालय ने पत्रावली पर उपलब्ध समस्त मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य का अवलोकन कर विवाद्यक संख्या 1 से 6 को वादिया के विरुद्ध निर्णीत करने में कोई विधिक भूल अथवा त्रुटि नहीं की है। ऐसी स्थिति में वादिया की ओर से प्रस्तुत यह अपील स्वीकार किया जाना न्यायोचित प्रतीत नहीं होता है।
परिणामतः अपीलार्थीया/वादिया की ओर से प्रस्तुत यह अपील सारहीन होने से अस्वीकार कर खारिज की जाती है तथा विद्वान अपर जिला एवं सेशन न्यायाधीश क्रम–2, जयपुर जिला जयपुर द्वारा दीवानी वाद संख्या 42/2018 (31/2010), श्रीमती गोमा देवी बनाम लक्ष्मीनारायण व अन्य में पारित आलोच्य निर्णय एवं डिक्री दिनांक 08.02.2019 की पुष्टि की जाती है। खर्चा पक्षकारान अपना–अपना स्वयं वहन करेंगे। तदनुसार डिक्री तैयार की जावे।
संलग्न प्रार्थना पत्र, यदि कोई लंबित हों, उक्तानुसार निस्तारित किये जाते हैं।
विद्वान विचारण न्यायालय का अभिलेख, यदि प्राप्त हो रखा हो, तो इस आदेश की प्रति के साथ लौटाया जावे।
इस आदेश में दिया गया कोई भी मत पक्षकारान के मध्य लंबित 138 परक्राम्य लिखत अधिनियम के प्रकरण व दीवानी वाद लक्ष्मीनारायण बनाम गोमा देवी व अन्य में लंबित सिविल प्रकरण के गुणावगुण पर निस्तारण कोई विपरीत प्रभाव नहीं डालेगा। संबंधित न्यायालय उक्त प्रकरणों में प्रस्तुत साक्ष्य के अनुरूप विधि अनुसार प्रकरण का निस्तारण करने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।
