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Judgment
अधीनस्थ विचारण न्यायालय, सिविल न्यायाधीश (कनिष्ठ खण्ड) कोटा दक्षिण द्वारा दीवानी वाद संख्या-119/2010 , 121/2010, 123/2010, 117/2010, 118/2010, 124/2010, 122/2010 में पारित पृथक-पृथक निर्णय एवं डिक्री (जिसके तहत वादीगण के वाद विरूद्ध प्रतिवादीगण बाबत् स्थायी निषेधाज्ञा डिक्री किए गये) के क्रम में प्रतिवादीगण द्वारा विद्वान अपीलीय न्यायालय अपर जिला न्यायाधीश, क्रम संख्या 3, कोटा में प्रस्तुत दीवानी नियमित अपीलें क्रमशः संख्या 13/2013, 14/2013, 9/2013, 11/2013, 15/2013, 10/2013, 8/2013 में पारित निर्णय एवं डिक्री दिनांक 26.4.2014 के तहत खारिज की जाकर विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय एवं डिक्री की पुष्टि की गई, के विरूद्ध प्रतिवादीगण/अपीलार्थीगण द्वारा उक्त द्वितीय अपीलें प्रस्तुत कीं गई।
चूंकि उक्त सभी मामलें में वाद विवाद की विषयवस्तु लगभग एक समान हैं, अतः उक्त सभी द्वितीय अपीलें का इस एक ही आदेश के माध्यम से निम्नवत् निस्तारण किया जा रहा है।
दोनों पक्षों के योग्य अधिवक्तागण द्वारा निवेदन किया गया कि इन द्वितीय अपीलों में अंकित सारभूत प्रश्नों के क्रम में दोनों विद्वान अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा पारित निर्णयों में पर्याप्त अंकन है, अतः बिना अधीनस्थ न्यायालयों के अभिलेख के इस अपील को विचारार्थ ग्रहण किए जाने के क्रम में सुन लिया जावें।
निवेदन अनुसार इन द्वितीय अपीलों को विचारार्थ ग्रहण किये जाने के क्रम में सुना गया।
योग्य अधिवक्ता अपीलार्थी द्वारा कथन किया गया कि दोनों विद्वान अधीनस्थ न्यायालयों ने प्रतिवादी/अपीलार्थीगण द्वारा परीक्षित करवाये गये साक्षी डी.डब्ल्यू. 1 की साक्ष्य को पढने एवं समझने में त्रुटि कारित की है तथा उसके कथनां को नजरअन्दाज किया गया है। इसके अलावा उनका यह भी कथन रहा कि प्रतिवादीगण की ओर से अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष क्षेत्राधिकार के बिन्दू के क्रम में जो ऐतराज लिया गया, उसे भी नजरअन्दाज कर अपीलाधीन निर्णय पारित किए गये, जो विधिसम्मत नहीं है। अतः उक्त सभी द्वितीय अपीलों में प्रस्तावित विधि के सारभूत प्रश्नों की रोशनी में अपीलों को विचारार्थ ग्रहण किए जाने का निवेदन किया गया।
उक्त तर्को का विरोध करते हुए विद्वान अधिवक्ता प्रत्यर्थी/वादी की ओर से निवेदन किया गया कि दोनों अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा पारित अपीलाधीन निर्णय एवं डिक्री पूर्ण रूप से विधिसम्मत हैं, जिनमें हस्तक्षेप की गुंजाईश नहीं है। उनका यह भी कथन रहा कि इन्हीं प्रकरणों के समान अधीनस्थ न्यायालय में प्रस्तुत वाद संख्या 120/2010 के क्रम में प्रतिवादीगण/अपीलार्थीगण की ओर से प्रस्तुत की गई प्रथम अपील प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा खारिज किए जाने के उपरांत इस न्यायालय में प्रस्तुत द्वितीय अपील संख्या 317/2014 को इस न्यायालय की समकक्ष पीठ द्वारा पारित आदेश दिनांक 21.3.2018 के तहत खारिज किया जा चुका है तथा उक्त आदेश के क्रम में प्रस्तुत पुनरावलोकन याचिका संख्या 70/2018 को भी खारिज किया जा चुका है। उनका कथन रहा कि वर्तमान सभी अपीलें भी उक्त अपील से भिन्न नहीं है, परिणामस्वरूप यह समस्त अपीलें भी ग्रहणार्थ प्रक्रम पर ही खारिज किए जाने योग्य है। अपने कथनां के समर्थन में उनकी ओर से इस न्यायालय की समकक्ष पीठ द्वारा सिविल द्वितीय अपील संख्या 317/2014 में पारित निर्णय दिन ांक 21.3.2018 तथा विविध पुनरावलोक याचिका संख्या 70/2018 में पारित आदेश दिनांक 28.9. 2018 की प्रतियां प्रस्तुत की गई, जो शामिल पत्रावली रहें।
इन सभी द्वितीय अपीलों में उठाये गये मुद्दों एवं मौखिक रूप से प्रस्तुत तर्कों की रोशनी में अधीनस्थ विचारण न्यायालय एवं अधीनस्थ अपीलीय न्यायालय द्वारा निकाले गये निष्कर्षो एवं पारित निर्णयों में अंकित तथ्यों पर ध्यान केन्द्रित किया गया।
स्वीकृत रूप से वर्तमान प्रकरण के वादीगण/ प्रत्यर्थीगण द्वारा जिन आधारों पर भिन्न-भिन्न वाद विद्वान अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गये थे, उन्हीं आधारां पर अन्य वादी द्वारा प्रस्तुत वाद संख्या 120/2010 भी अधीनस्थ न्यायालय द्वारा डिक्री किया गया था तथा उक्त मामले में भी प्रथम अपील विद्वान प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा खारिज किए जाने के उपरांत इस न्यायालय में प्रस्तुत द्वितीय अपील संख्या 317/2014 को इस न्यायालय की समकक्ष पीठ द्वारा खारिज किया जा चुका है। इस न्यायालय की समकक्ष पीठ द्वारा उक्त द्वितीय अपील में पारित निर्णय दिनांक 21.3.2018 का अवलोकन करने पर प्रकट होता है कि न्यायालय ने राजस्व न्यायालय के क्षेत्राधिकार का बिन्दू प्रतिवादीगण द्वारा जवाब जवाब में अंकित नहीं करने तथा इस क्रम में विवाद्यक विरचित नहीं होने, अपीलार्थीगण की ओर से अधीनस्थ न्यायालय में विवादित खसरा नम्बर के मालिकाना हक के क्रम में दस्तावेज पेश नहीं किए जाने के साथ-साथ डी.डब्ल्यू.1 पुरूषोत्तम चित्तौडा की साक्ष्य की रोशनी में उक्त अपील में विधि का सारभूत प्रश्न बनना नहीं माना था। इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण तथ्य है कि उक्त अपील संख्या 317/2014 के क्रम में साक्षी डी.डब्ल्यू. 1 पुरूषोत्तम चित्तौडा की साक्ष्य के सम्बन्ध में प्रस्तुत पुनरावलोकन याचिका संख्या 70/2018 भी इस न्यायालय की समकक्ष पीठ द्वारा खारिज की जा चुकी है। स्वीकृत रूप से वर्तमान द्वितीय अपीलां में प्रस्तावित विधि के सारभूत प्रश्न उक्त अपील संख्या 317/2014 के समान हैं। इसके अलावा अधीनस्थ विचारण द्वारा पारित अपीलाधीन निर्णय एवं डिक्री के तहत वादी का कोई निर्माण खसरा नम्बर 21, ग्राम कोटडी तालाब की पाल की सीमा में पाये जाने पर प्रतिवादी/ अपीलार्थीगण को नियमानुसार कार्यवाही करने की स्वतंत्रता भी प्रदान की गई है।
उक्त विवेचन की रोशनी में इस न्यायालय की राय में दोनों अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा पारित आक्षेपित निर्णयों में ऐसी कोई साक्ष्य समाहित नहीं है, जो असंगत व अग्राह्य हो या तथ्यात्मक स्थिति की उपलब्धता के अभाव में निर्णय पारित किए गये हो, न ही साक्ष्य का विश्लेषण व विवेचन करने में दोनों अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा किसी प्रकार की चूक की गई है तथा न ही अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा निकाला गया निष्कर्ष तथ्यों के विपरीत है। अतः प्रकरणों में उपलब्ध साक्ष्य के विश्लेषण व विवेचन की दृष्टि से आक्षेपित निर्णयों में ऐसी कोई त्रुटि प्रकट नहीं होती है, जिसके तहत साक्ष्य के आधार पर प्रकरणों में सारभूत कानूनी प्रश्न (substantial law question) बनना पाया जाता हो।
जहॉं तक वर्तमान मामले में अन्य कानूनी एवं सारभूत प्रश्न विद्यमान होने के बाबत उठाये गये तर्कों का प्रश्न है। आक्षेपित निर्णयों में न तो क्षेत्राधिकार, न ही पोषणीयता के तत्व का अभाव पाया जाता है, न ही योग्य अधिवक्ता अपीलार्थी द्वारा उठाया गया मुद्दा कानून के विश्लेषण का प्रश्न है, न ही विवाद का आधारभूत अंग है। अतः अन्य सारभूत एवं कानूनी प्रश्न के आधार पर भी वर्तमान सभी द्वितीय अपीलें ग्रहणार्थ स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है।
परिणामतः अपीलार्थीगण/प्रतिवादीगण की ओर से प्रस्तुत उक्त सभी द्वितीय सिविल अपीलें ग्रहणार्थ प्रक्रम पर ही खारिज कीं जाती हैं। तद्नुसार स्थगन प्रार्थना पत्र भी खारिज किए जाते हैं।
यह आदेश/निर्णय आज दिनांक 10.1.2019 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348 (i) के तहत भारत सरकार की अधिसूचना राजपत्र संख्या-1, दिनांक 2 जनवरी, 1999 एवं राजस्थान राजपत्र दिनांकित 10.3.1971 के तहत हिन्दी भाषा के प्रयोग को प्राधिकृत किए जाने के परिणामस्वरूप हिन्दी भाषा में लिखाया गया।
