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Judgment
अपीलार्थीगण की ओर से यह द्वितीय अपील अपर जिला न्यायाधीश, अनूपगढ़ जिला श्रीगंगानगर द्वारा पारित निर्णय एवं आदेश दिनांक 21.02.2019 के विरूद्ध प्रस्तुत की गई है। जिसके द्वारा अपीलीय न्यायालय ने विचारण न्यायालय सिविल न्यायाधीश (वरिष्ठ खंड), अनूपगढ द्वारा मूल वाद संख्या 09/01 अमरीकसिंह व अन्य बनाम शंकरसिंह में पारित निर्णय व डिक्री दिनांक 24.02.2010 के विरूद्ध प्रस्तुत दीवानी अपील संख्या 16/2013 को खारिज किया गया।
प्रकरण के तथ्य संक्षिप्त में इस प्रकार है कि अपीलार्थीगण की ओर से सिविल न्यायाधीश (वरिष्ठ खण्ड), अनूपगढ़ के समक्ष एक वाद बाबत् संविदा की विनिर्दिष्ट पालना बाबत् दिनांक 06.10.2001 को इस आशय का पेश किया गया कि प्रत्यर्थी शंकर के नाम से चक 1 एन.डब्ल्यू.एम. तहसील अनूपगढ़ का मुरब्बा नं. 220/50 के किला नंबर 1 ता 25 कुल 25 बीघा (जिसे आगे इस निर्णय में विवादित भूमि के नाम से सम्बोधित किया जायेगा) बतौर पोंग बान्ध विस्थापितों के पुख्ता आवंटित की गई। प्रतिवादी शंकर ने उक्त कृषि भूमि के संबंध में श्री रामलाल को अपना मुख्तयारआम दिनांक 06.05.75 को नियुक्त कर मुख्तयारनामा पंजीकृत करवाया। आवंटी शंकरलाल ने मुख्तयारआम रामलाल को उक्त भूमि के बेचान के अधिकार दिये, जिनके आधार पर रामलाल ने उक्त भूमि प्रतिवादी संख्या 2 व 3 को जरिये इकरारनामा दिनांक 21.06.78 को अक्षरे रूपये 50,000/- में बेचान किया। प्रतिवादी संख्या 2 व 3 द्वारा उक्त भूमि का वादीगण को आगे बेचान जरिये इकरारनामा दिनांक 25.05.79 कर रकम रूपये पचास हजार प्राप्त कर कब्जा मय पानी सुपुर्द कर दिया। विवादित भूमि पर तभी से लगातार वादीगण का कब्जा काश्त चला आ रहा है।
इकरारनामा की शर्त अनुसार प्रतिवादी सं. 2 व 3 खातेदारी प्राप्त होने के पश्चात वादीगण के पक्ष में प्रतिवादी संख्या 1 को लाकर बेचाननामा तहरीर व तस्दीक करवायेंगे।
शेष शर्तें विस्तारपूर्वक इकरारनामा दिनांक 25.05.79 में दर्ज की गई। वादीगण इकरारनामा दिनांक 25.05.79 की पालना में अपने समस्त कर्तव्य व दायित्व निभाकर बेचाननामा अपने पक्ष में पंजीबद्ध करवाने के लिये हमेशा तैयार व तत्पर थे। वादीगण ने प्रतिवादीगण से कई बार निवेदन किया कि वह इकरारनामा दिनांक 25.05.79 की अपने जिम्मे की तमाम औपचारिकताएं पूरी कर वादीगण के पक्ष में बेचाननामा निष्पादित करवाये, परन्तु प्रतिवादीगण टालमटोल करते रहे एवं दिनांक 20.09.2001 को प्रतिवादी सं.1 अपने साथ कुछ आदमियों को लेकर वादीगण से मिलकर कहा कि विवादित भूमि के दाम बढ़ जाने से वह भूमि का बेचाननामा नहीं करवायेगा और इस जमीन का कब्जा वापस लेगा। जिससे व्यथित होकर वादीगण की ओर से संविदा दिनांक 25.05.79 की विनिर्दिष्ट पालना बाबत् वाद संख्या 09/2001 प्रस्तुत किया गया।
वादीगण की ओर से वादपत्र पेश होने पर प्रतिवादीगण को तलब किया गया तथा प्रतिवादी संख्या 1 व 2 एवं 3 के विरूद्ध क्रमशः दिनांक 05.03.2002 एवं 03.05.2002 को एकपक्षीय कार्यवाही अमल में लाये जाने का आदेश पारित किया गया।
वादी की ओर से एकपक्षीय साक्ष्य में पी.डब्ल्यू 1 गुरचरणसिंह, पी.डब्ल्यू 2 अमरीकसिंह, पी.डब्ल्यू 3 तारासिंह, पी.डब्ल्यू 4 प्रभूदयाल, पी.डब्ल्यू 5 जंगीरसिंह, पी.डब्ल्यू 6 रामचन्द्र, पी.डब्ल्यू 7 मेहरचद एवं पी.डब्ल्यू 8 सुभाषचन्द्र के बयान दर्ज करवाये तथा दस्तावेजी साक्ष्य में मुख्तयारनामा प्रदर्श 1, इकरारनामा दिनांक 25.05.79 प्रदर्श 2 एवं इकरारनामा दिनांक 21.06.78 प्रदर्श 4 को प्रदर्शित करवाया गया।
विद्वान विचारण न्यायालय द्वारा एकपक्षीय बहस सुनी जाकर अपने निर्णय व डिक्री दिनांक 24.02.2010 के द्वारा वादी का वादपत्र निरस्त किये जाने का आदेश दिया जिसके विरूद्ध अपीलार्थीगण द्वारा अपर जिला न्यायाधीश, अनूपगढ़ जिला श्रीगंगानगर के समक्ष दिनांक 02.04.2013 को अपील प्रस्तुत की तथा साथ ही धारा 5 परिसीमा अधिनियम का प्रार्थना पत्र पेश किया गया।
दौराने प्रथम अपील अपीलार्थी अमरीकसिंह की मृत्यु हो जाने से अपीलार्थी संख्या 1 अमरीकसिंह के विधिक उत्तराधिकारीगण को पक्षकार बनाते हुए संशोधित शीर्षक अपील प्रस्तुत किया एवं अपीलार्थी संख्या 1 अमरीकसिंह के स्थान पर उनके वारिसान को अपीलार्थी संख्या 1/1 लगायत 1/5 के तौर पर जोड़ा गया।
विद्वान अधिवक्ता अपीलार्थी द्वारा प्रार्थना पत्र अन्तर्गत धारा 5 परिसीमा अधिनियम में कथन किया गया कि अपीलार्थीगण द्वारा विचारण न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष पेश करने के उपरान्त उनके अभिभाषक श्री मनोहरलाल अरोड़ा ने अपीलार्थीगण को कहा कि इस मुकदमे की पैरवी वे स्वयं करेंगे और आवश्यकता होगी तब वे अपीलार्थीगण को बुला लेंगे। अपीलार्थीगण ने अपने अभिभाषक के कथनों पर विश्वास किया। अपीलार्थीगण के अभिभाषक श्री मनोहरलाल अरोड़ा से अपीलार्थीगण को कोई भी सूचना नहीं मिलने पर अपीलार्थीगण यही समझते रहे कि वाद की कार्यवाही विचारण न्यायालय के समक्ष अभी भी विचाराधीन है। दिनांक 17.03.2013 को प्रत्यर्थी-प्रतिवादी संख्या 1 अपने साथ कुछ अन्य लोगां को लेकर विवादित कृषि भूमि पर आया और विवादित कृषि भूमि से अपीलार्थीगण को बेदखल करने की चेष्टा की जिस पर अपीलार्थीगण-वादीगण की जानकारी में आया कि विचारण न्यायालय के समक्ष विचाराधीन प्रकरण तीन साल पूर्व ही खारिज हो चुका है जिस पर अपीलार्थीगण-वादीगण ने अपने अभिभाषक श्री मनोहरलाल अरोड़ा से सम्पर्क कर जानकारी प्राप्त की तब प्रथम बार प्रार्थीगण को इस न्यायालय द्वारा पारित निर्णय एवं डिक्री दिनांक 24.02.2010 की जानकारी हुई। चूकि प्रतिवादी संख्या 1 ने उक्त दिनांक से पूर्व कभी भी विवादित कृषि भूमि से अपीलार्थीगण-वादीगण को बेदखल करने का प्रयास नहीं किया इसलिए अपीलार्थीगण-वादीगण को अधीनस्थ न्यायालय द्वारा पारित निर्णय एवं डिक्री दिनांक 24.02.2010 की जानकारी नहीं हो सकी। अपीलार्थीगण-वादीगण ग्रामीण परिवेश के भोले-भाले किसान है और अपने अधिवक्ता के कथनों पर ही विश्वास किया कि जब भी आवश्यकता होगी उन्हें बुला लेंगे। प्रार्थना पत्र में अपील पेश करने में हुई देरी को कण्डोन करने का निवेदन किया गया।
उक्त प्रार्थना पत्र का प्रतिवादी संख्या 1 की ओर से जवाब पेश किया गया जिसमें प्रार्थना पत्र में अकित तथ्यों को गलत होना बताया तथा प्रार्थना पत्र खारिज किये जाने का निवेदन किया।
अपीलीय न्यायालय द्वारा पक्षकारान की बहस सुनने के पश्चात अपने निर्णय व डिक्री दिनांक 21.02.2019 के द्वारा प्रार्थना पत्र अन्तर्गत धारा 5 परिसीमा अधिनियम, 1963 खरिज किये जाने का आदेश दिया, जिसके विरूद्ध मौजूदा अपील प्रस्तुत की गई है।
अपीलार्थीगण-वादीगण की ओर से उनके विद्धान अधिवक्ता ने तर्क दिया है कि अपीलार्थीगण-वादीगण ने प्रथम अपीलीय न्यायालय के समक्ष अपने प्रार्थना पत्र में स्पष्ट रूप से यह अंकित किया कि उनके अधिवक्ता श्री मनोहरलाल अरोड़ा ने विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय एवं डिक्री दिनांक 24.02.2010 की जानकारी उन्हें नहीं दी और इसी कारण से अपीलार्थीगण-वादीगण समय पर अपील प्रस्तुत नहीं कर सके। उनका तर्क है कि अधिवक्ता की गलती के कारण किसी पक्षकार को उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। उनका तर्क है कि मौजूदा मामला अचल सम्पत्ति के अधिकारों से संबंधित है, जिसका निर्णय गुणावगुण पर ही होना चाहिये। अधिकारों से तकनीकी आधार पर वादी को ऐसे अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। उनका यह भी तर्क है कि अधीनस्थ न्यायालय ने इस तथ्य की ओर कतई गौर नहीं किया है कि प्रार्थी ने अपने प्रार्थना पत्र अन्तर्गत धारा 5 परिसीमा अधिनियम, 1963 के समर्थन में शपथ पत्र पेश किया था, जिसका कोई खण्डन पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर नहीं होता है। अपीलार्थीगण-वादीगण ग्रामीण परिवेश के अशिक्षित व्यक्ति है, उन्हें कानून की तकनीकियों की जानकारी नही है अतः ऐसी स्थिति में प्रकरण का गुणावगुण के आधार पर ही निर्णय किया जाना चाहिए। उन्होंने, अंत में, अपील स्वीकार कर प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा पारित निर्णय को अपास्त किये जाने की प्रार्थना की।
इसके विपरीत प्रत्यर्थीगण-प्रतिवादीगण के विद्वान अधिवक्ता ने उक्त तर्कों का खण्डन करते हुए प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा पारित आदेश को उचित एवं विधि अनुसार बताते हुए यह अपील खारिज किये जाने की प्रार्थना की। उनका तर्क है कि प्रथम अपीलीय न्यायालय के समक्ष लगभग तीन वर्ष पश्चात अपील पेश की गई है, किन्तु देरीना अपील पेश करने का कोई उचित कारण नहीं बताया गया है।
उभय पक्षों के तर्कों को सुना गया एवं मनन किया गया। पत्रावली का अवलोकन किया गया। मौजूदा मामले में इस न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह है कि -
''क्या अपीलीय न्यायालय ने अपीलार्थीगण द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना पत्र अन्तर्गत धारा 5 परिसीमा अधिनियम, 1963 के संबंध में देरी क्षम्य करने का उचित व पर्याप्त कारण न मानते हुए खारिज करने में त्रुटी की है?''
पत्रावली के अवलोकन से प्रकट होता है कि अपीलार्थीगण-वादीगण द्वारा प्रस्तुत वाद विचारण न्यायालय द्वारा अपने निर्णय एवं डिक्री दिनांक 24.02.2010 के द्वारा एकपक्षीय खारिज किये जाने का आदेश दिया गया है। अपीलार्थीगण- वादीगण का यह कहना है कि उनके अधिवक्ता श्री मनोहरलाल अरोड़ा द्वारा उन्हें उक्त निर्णय एवं डिक्री की जानकारी नहीं दी गई और जानकारी होने पर उनके द्वारा दिनांक 02.04.2013 को अपीलीय न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की गई। अपीलार्थीगण-वादीगण द्वारा अपने प्रार्थना पत्र के समर्थन में शपथ पत्र भी पेश किया गया है।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने N. Balakrishnan, Versus M. Krishnamurthy AIR 1998 Supreme Court 3222 के मामले में पक्षकार के अधिवक्ता द्वारा पक्षकार को सूचित न करने के कारण कार्यवाही करने में हुई 883 दिन की देरी को क्षम्य किया जाना उचित माना है।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने IMRATLAL AND OTHERS V/s LAND ACQUISITION COLLECTOR AND OTHERS (2014) 14 Supreme Court Cases 133 के मामले में पैरा संख्या 11 में निम्नलिखित मत व्यक्त किया गया है -
"11. We can take judicial notice of the fact that villagers in our country are by and large illiterate and are not conversant with the intricacies of law. They are usually guided by their covillagers, who are familiar with the proceedings in the courts or the advocates with whom they get in touch for redressal of their grievance. Affidavits filed in support of the applications for condonation of delay are usually drafted by the advocates on the basis of half-baked information made available by the affected persons. Therefore, in the acquisition matters involving claim for award of just compensation, the court should adopt a liberal approach and either grant time to the party to file better affidavit to explain delay or suo motu take cognizance of the fact that large number of other similarly situated persons who were affected by the determination of compensation by the Land Acquisition Officer or the Reference Court have been granted relief."
माननीय उच्चतम न्यायालय ने Collector, Land Acquisition, Anantnag and Ors. vs. Katiji and Ors. AIR 1987 SUPREME COURT 1353 के मामले में निम्नलिखित मत व्यक्त किया गया है -
"3. ....
Ordinarily a litigant does not stand to benefit by lodging an appeal late.
Refusing to condone delay can result in a meritorious matter being thrown out at the very threshold and cause of justice being defeated. As against this when delay is condoned the highest that can happen is that a cause would be decided on merits after hearing the parties.
"Every day's delay must be explained" does not mean that a pedantic approach should be made. Why not every hour's delay, every second's delay? The doctrine must be applied in a rational common sense pragmatic manner.
When substantial justice and technical considerations are pitted against each other, cause of substantial justice deserves to be preferred for the other side cannot claim to have vested right in injustice being done because of a non-deliberate delay.
There is no presumption that delay is occasioned deliberately, or on account of culpable negligence, or on account of malafides. A litigant does not stand to benefit by resorting to delay. In fact he runs a serious risk.
It must be grasped that judiciary is respected not on account of its power to legalize injustice on technical grounds but because it is capable of removing injustice and is expected to do so."
उपरोक्त न्यायिक दृष्टांतों की रोशनी में इस प्रकरण को देखने से स्पष्ट है कि मौजूदा मामला भूमि के विक्रय अनुबंध की पालना के संबंध में है, ऐस प्रकरण का निस्तारण गुणावगुण के आधार पर ही किया जाना न्यायोचित है। अपीलार्थीगण-वादीगण जानबूझकर समय अवधि में अपील प्रस्तुत क्यों नहीं करेगा ऐसा कोई कारण स्पष्ट नहीं होता है, जबकि अपीलार्थीगण-वादीगण का स्पष्ट कथन रहा है कि उनके अधिवक्ता द्वारा उन्हें विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय एवं डिक्री की जानकारी नहीं दी गई थी। माननीय उच्चतम न्यायालय के उक्त न्यायिक दृष्टांतों की रोशनी में तकनीकी आधार पर अपीलार्थीगण को अचल सम्पत्ति के अधिकारों से वंचित किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। यहां यह कहना विधिसंगत होगा कि अपीलार्थीगण- वादीगण विचारण न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं हुए हैं और उनके विरूद्ध एकपक्षीय कार्यवाही की गई है।
ऐसी स्थिति में प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा प्रार्थना पत्र अन्तर्गत धारा 5 परिसीमा अधिनियम खारिज किए जाने का जो आदेश दिया गया है वह विधिसम्मत नहीं माना जा सकता। अतः प्रकरण के समस्त तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए अपीलार्थीगण-वादीगण द्वारा रूपये 10,000/-(अक्षरे रूपये दस हजार) की कॉस्ट (क्षतिपूर्ति) पर प्रार्थना पत्र अन्तर्गत धारा 5 परिसीमा अधिनियम, 1963 स्वीकार किया जाता है, तो इस न्यायालय की राय में न्याय की पूर्ति हो जायेगी। 17. अतः अपील अपीलार्थीगण स्वीकार किये जाने योग्य होने से स्वीकार की जाती है। निर्णय एवं डिक्री दिनांक 21.02.2019 अपास्त किया जाता है।
अतः प्रकरण प्रथम अपीलीय न्यायालय को प्रतिप्रेषित कर निर्देश दिया जाता है कि अपीलार्थीगण-वादीगण द्वारा रूपये 10,000/- (अक्षरे रूपये दस हजार) की कॉस्ट(क्षतिपूर्ति) प्रतिवादीगण को अदा करने पर दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर प्रदान कर गुणावगुण के आधार पर निर्णय पारित करे।
तदनुसार, स्थगन याचिका निस्तारित की जाती है।
दोनों पक्षों को अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष दिनांक 06.02.2020 को उपस्थित होने के लिए निर्देशित किया जाता है।
नियमानुसार, कार्यवाही कर विचारण न्यायालय का अभिलेख लौटाया जावे।
