High CourtsSingle Bench(2019) 08 RAJ CK 0228

Shyam Sunder vs State Of Rajasthan And Ors

Rajasthan High Court · Decided on 2 August 2019

HON’BLE JUDGES
Mahendra Maheshwari, J
RESULT
Allowed
CASE NUMBER
Criminal Revision Petition No. 1325 Of 2019

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Judgment

5 paragraphs · 597 words

अधीनस्थ विचारण न्यायालय, किशोर न्याय बोर्ड, भरतपुर द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या-224/2019 पुलिस थाना, कुम्हेर, जिला-भरतपुर में पारित आदेश दिनांक 01.06.2019, जिसके तहत याची-किशोर का प्रार्थना पत्र अंतर्गत धारा 12 किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम खारिज किया गया एवं अधीनस्थ अपीलीय न्यायालय, विशेष न्यायालय लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 तथा बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005, संख्या-1, भरतपुर द्वारा जमानत आवेदन संख्या-34/2019 में पारित आद ेश दिनांक 07.06.2019, जिसके तहत याची-किशोर की ओर से प्रस्तुत जमानत सुपुर्दगी का प्रार्थना पत्र खारिज किया गया है, से व्यथित होकर याची-किशोर की ओर से जरिये संरक्षक यह फौजदारी पुनरीक्षण याचिका (जमानत) प्रस्तुत की गई है।

बहस सुनी गई। योग्य अधिवक्ता याची का कथन रहा कि याची अवयस्क किशोर है उनका कथन रहा है कि अधीनस्थ न्यायालय ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया है कि किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों के तहत जमानत आवेदन पत्र में मात्र अभियुक्त की आयु तथा अभियुक्त के ज्ञात-अज्ञात व्यक्तियों के सम्पर्क में आने के तथ्य को ध्यान में रखना होता है, किन्तु दोनों अधीनस्थ न्यायालयों ने मात्र गुणावगुण के आधार पर आलोच्य आदेश पारित किया है। परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट एवं संबंधित पुलिस थाने की रिपोर्ट में याची-किशोर के विरूद्ध किसी प्रकार का अन्य मुकदमा दर्ज नहीं है। आपसी गलतफहमी के क्रम में यह मुकदमा दर्ज कराया गया है तथा याची-किशोर के पिता द्वारा पंचायती समझाईश के परिणामस्वरूप राशि का भुगतान किया जा चुका है तथा प्रकरण को आपसी समझाईश से खत्म किया जा चुका है। उनका कथन रहा है कि परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट प्रतिकूल नहीं है। अतः निगरानी याचिका स्वीकार कर दोनों अधीनस्थ विचारण न्यायालय, किशोर न्याय बोर्ड, भरतपुर तथा अधीनस्थ अपीलीय न्यायालय, विशेष न्यायालय लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 तथा बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005, संख्या-1, भरतपुर द्वारा पारित आलोच्य आदेश को अपास्त करते हुए याची-किशोर को जमानत का लाभ दिये जाने की प्रार्थना की गई।

विद्वान अधिवक्ता परिवादी ने भी दोनों पक्षों के मध्य आपसी समझाईश होने के तथ्य को स्वीकार किया तथा योग्य लोक अभियोजक ने न्यायालय के समक्ष परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट तथा पुलिस थाने की रिपोर्ट प्रस्तुत कर निगरानी याचिका अस्वीकार किये जाने की प्रार्थना की।

समस्त तथ्यों पर विचार किया गया। प्रकरण की तथ्यात्मक स्थिति के संबंध में अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा दिये गये निष्कर्ष की रोशनी में याची-किशोर की ओर से न्यायालय के समक्ष उठाये गये कानूनी मुद्दे, परिवीक्षा अधिकारी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में याची के विरूद्ध कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं होने, याची-किशोर के विरूद्ध अन्य कोई प्रकरण विचाराधीन नहीं होने एवं ज्ञात-अज्ञात अभियुक्त के सम्पर्क में आने बाबत् कोई साक्ष्य पत्रावली पर नहीं होने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए एवं विशेषकर दोनों पक्षों के मध्य आपसी समझाईश होने के तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए यह जमानत पुनरीक्षण याचिका स्वीकार किये जाने योग्य है।

परिणामतः याची की ओर से जरिये संरक्षक प्रस्तुत यह फौजदारी पुनरीक्षण याचिका स्वीकार की जाती है और अधीनस्थ विचारण न्यायालय, किशोर न्याय बोर्ड, भरतपुर द्वारा पारित आदेश दिनांक 01.06.2019 एवं अधीनस्थ अपीलीय न्यायालय, विशेष न्यायालय लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 तथा बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम 2005, संख्या-1, भरतपुर द्वारा पारित आदेश दिनांक 07.06.2019, अपास्त किये जाकर आदेश दिया जाता है कि यदि याची की ओर से उसका संरक्षक अधीनस्थ विचारण न्यायालय के संतोषप्रद, पचास हजार रूपये का बन्ध-पत्र एवं पच्चीस-पच्चीस हजार रूपये की दो प्रतिभूतियॉं इन शर्तों के साथ प्रस्तुत कर तस्दीक करवा दे कि जमानत के दौरान वह याची-किशोर को अपनी संरक्षकता में सुरक्षित रखेगा, किसी आपराधिक तत्व के सम्पर्क में नहीं आने देगा एवं न्यायालय द्वारा तलब किये जाने पर याची-किशोर को न्यायालय में उपस्थित कर देगा तो उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाए।