AI Structured Summary
Not yet generated for this judgment
Judgment
अभय चतुर्वेदी, न्यायाधिपति
यह अपील न्यायालय अपर सेशन न्यायाधीश, रायसिंहनगर (श्रीगंगानगर) द्वारा सेशन प्रकरण संख्याः 22/2011 में पारित निर्णय एवं दण्डादेश दिनाँक 01.12.2012 के विरूद्ध प्रस्तुत की गई है। जिसके द्वारा न्यायालय ने अपीलार्थी/अभियुक्त (जिसे आगे अभियुक्त के नाम से सम्बोधित किया जावेगा) को अपराध अंतर्गत धारा 302, 201, 394 भारतीय दण्ड संहिता के अपराधों में दोषसिद्ध किया जाकर निम्न प्रकार से दण्डित किये जाने का आदेश दिया :-
नाम
अपराध धारा
सजा
व जुर्माना
परमजीतसिंह
302भा.दं.सं.
आजीवन कारावास
एवं 3000/-रूपये
उर्फ पम्मा
जुर्माना
201भा.दं.सं.
दो वर्ष के कठोर कारावास एवं
2000/-रूपये जुर्माना
394भा.दं.सं.
394भाण्दंण्संण्
अभियुक्त की सभी मूल सजाएँ साथ-साथ चलाई जाने का आदेश दिया गया।
प्रकरण से संबंधित तथ्य संक्षिप्त में इस प्रकार है कि दिनाँक 31.05.2011 को वीरूराम, सरपंच ग्राम ख्यालीवाला (पी.डब्ल्यू.1) ने थानाधिकारी पुलिस थाना गजसिंहपुर को इस आशय की सूचना दी कि उनके गाँव की न्यू एफ.डी. नहर में गुरजंटसिंह के खेत के पास एक अज्ञात व्यक्ति की लाश पीछे से पानी में बहकर आई, जिसके गर्दन, मुँह व हाथों पर कटनुमा चोटें लगी हुई हैं। जिस पर इस सूचना को पुलिस थाना गजसिंहपुर के रोजनामचा में दर्ज कर पी.डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री मौके पर रवाना हुए। जहाँ उक्त वीरूराम ने श्री विष्णु खत्री को एक लिखित रिपोर्ट प्रदर्श पी.8 पेश की, जिसमें उल्लेख किया गया है कि दिनाँक 31.05.2011 को उसे गाँव के लोगों ने बताया कि उनके गाँव में नई एफ.डी.नहर में गुरजंटसिंह गिल के खेत के पास अज्ञात व्यक्ति की लाश पीछे से पानी में बहकर आई है जिस पर वह तथा मिठूसिंह, कौरिंसह, जगसिरसिंह, रिछपालसिंह वगैरा लाश के पास गये और देखा तो उसकी गर्दन, मुँह व हाथों पर कटनुमा चोटें लगी हुई थी, लाश से बदबू आ रही थी। जिसके शरीर पर लाल रंग की धारीदार टेरीकोट की शर्ट व काले रंग की पेंट पहन रखी थी और बाँये हाथ में लोहे का कड़ा था। लाश गली-सड़ी एवं फूली हुई थी जो 4-5 दिन पुरानी लग रही थी जिसकी उम्र करीब 35-40 साल के लगभग थी। उक्त रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि उक्त व्यक्ति की गर्दन, मुँह व हाथों पर चोटें मारकर पीछे नहर में अज्ञात व्यक्तियों ने फेंक दिया है जिससे इसकी मौत हुई है। उक्त रिपोर्ट के आधार पर पुलिस थाना गजसिंहपुर में प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्या 68/2011 (प्रदर्श पी.41) अंतर्गत धारा 302, 201 भारतीय दण्ड संहिता दर्ज हुई तथा पी.डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री द्वारा अनुसंधान प्रारम्भ किया गया।
दौराने अनुसंधान पंचनामा लाश प्रदर्श पी.2, नक्शा-मौका प्रदर्श पी.3 बनाया गया तथा मृतक के कपड़े शर्ट रंग लाल लाईनदार, काले रंग की पेंट तथा मृतक के हाथ में पहना लोहे का कड़ा जब्त किया गया। साथ ही मृतक की पेंट की जेब से लोहे की चाबी जिस पर ए खुदा था मय काला छल्ला को कब्जा पुलिस लिया गया। मृतक का पोस्टमार्टम पी.डब्ल्यू.6 डॉ. कुन्दनलाल मादनपौत्रा के द्वारा किया गया। दिनाँक 01.06.2011 को श्री गोकलचंद (पी.डब्ल्यू.2) ने मृतक के कपड़े व चाबी के आधार पर लाश को अपने भाई नरेशकुमार के रूप में पहचाना। मृतक के पेंट की जेब से मिली चाबी फर्म अश्वनीकुमार विजय कुमार 54 पुरानी धानमण्डी, श्रीकरणपुर के गोदरेज की आलमारी की होना मृतक के छोटे भाई चरणदास द्वारा बताया गया तथा मृतक का उक्त फर्म अश्वनी कुमार विजय कुमार में मुनीम के रूप में कार्य करना बताया गया। उक्त चाबी को ले जाकर उक्त फर्म के मालिक अश्वनीकुमार को दिखाया गया तो उसने चाबी उनकी फर्म में रखी गोदरेज की अलमारी की होना तथा उसे अपने मुनीम नरेश कुमार (मृतक) के पास होना तथा उसकी दूसरी चाबी उसके स्वयं के पास होना बताया। उस चाबी को गोदरेज की अलमारी में लगाकर देखा गया तो अलमारी का ताला खुलना पाया गया।
दौराने अनुसंधान मृतक नरेश कुमार के मोबाईल नंबर 9667610861 की कॉल डिटेल निकलवाई गई, जिनकी जाँच करने पर मोबाईल नंबर 8890557708 संदिग्ध होना पाया गया, जिसकी कॉल डिटेल अलग से निकलवाई गई। उक्त मोबाईल नंबर 8890557708 की सिम अभियुक्त परमजीत सिंह के नाम से होने पर अभियुक्त को गिरफ्तार किया गया।
दौराने अनुसंधान अभियुक्त द्वारा स्वेच्छा से मृतक की हत्या कर लाश नहर में फेंकने के स्थान की सूचना दी जिसे फर्द प्रदर्श पी.70 के रूप में दर्ज किया गया। उक्त सूचना के अनुसरण में अभियुक्त द्वारा वह स्थान बताया गया, जहाँ पर उसके द्वारा मृतक की हत्या कर लाश को नहर में फेंका गया था, इस बाबत् फर्द निशादेही (प्रदर्श पी.13)बनाई गई तथा उसी स्थान से सड़क, डामर-बजरी व ईंट खून आलूदा, छेनी-हथौड़ा से उखाड़कर जरिये फर्द जब्ती (प्रदर्श पी. 14) जब्त किया गया एवं नक्शा-मौका प्रदर्श पी.15 व हालात निरीक्षण प्रदर्श पी.15ए बनाये गये। अभियुक्त द्वारा दी गई सूचना अंतर्गत धारा 27साक्ष्य अधिनियम (प्रदर्श पी.71) के अनुसरण में अभियुक्त ने अपने मकान में पहुँचकर मोबाईल फोन सफेद नोकिया बरामद करवाया, जिसमें बैटरी व सिम नहीं थी जिसे मौके पर जब्त कर सील किया गया तथा अभियुक्त के मकान से ही उसकी मोटरसाईकिल यामाहा जब्त की गई तथा इस सम्बन्ध में फर्द प्रदर्श पी.16, नक्शा-मौका प्रदर्श पी.17 व हालात मौका प्रदर्श पी.17ए बनाये गये।
दौराने अनुसंधान अभियुक्त द्वारा दी गई सूचना अंतर्गत धारा 27 साक्ष्य अधिनियम (प्रदर्श पी.72) के अनुसरण में अभियुक्त के घर में स्थित कुई से एक बटुआ, कापा, कपड़े जरिये श्री रामदास निकलवाये गये। बटुवे के अन्दर दो फोटो, एक आयकर कार्ड, एक एटीम कार्ड पंजाब नेशनल बैंक, एक शोपिंग कार्ड, एक मोबाईल एमटीएस कम्पनी जिसमें सिम व बैटरी थी, अलग से 13 सिम, अभियुक्त द्वारा वक्त घटना पहने हुए कपड़े साफा, टी शर्ट व बनियान तथा लोहे का कापा को जरिये फर्द जब्ती प्रदर्श पी.18 जब्त किया गया तथा नक्शा-मौका बरामदगी व हालात मौका बरामदगी क्रमशः प्रदर्श पी.19 व प्रदर्श पी.19ए बनाये गये। अभियुक्त से जब्तशुदा कापा, अभियुक्त व मृतक के कपड़े तथा अभियुक्त द्वारा बताये गये घटनास्थल से जब्त किये गये डामर व ईंट के टुकड़े को एफ.एस.एल. में रासायनिक जाँच हेतु भेजा गया। एफ.एस.एल.द्वारा जाँच रिपोर्ट प्रदर्श पी.76 के अनुसार जब्तशुदा डामर, ईंट, कापा, मृतक व अभियुक्त के कपड़ों पर ''बी'' ग्रुप का रक्त होना पाया गया।
दौराने अनुसंधान गवाहान के बयान अन्तर्गत धारा 161 दण्ड प्रक्रिया संहिता लेखबद्ध किये गये तथा बाद तफ्तीश पुलिस द्वारा संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष अभियुक्त के विरूद्ध धारा 302, 201, 394, 120बी. भारतीय दण्ड संहिता के तहत चालान पेश किया गया, जहाँ से कमिट होकर यह प्रकरण विचारण न्यायालय में प्राप्त हुआ।
विचारण न्यायालय द्वारा अभियुक्त के विरूद्ध धारा 302, 201, 394, 120बी. भारतीय दण्ड संहिता के आरोप विरचित कर सुनाये व समझाये गये, तो अभियुक्त ने आरोप सुन, समझकर आरोप अस्वीकार किये और अन्वीक्षा चाही।
अभियोजन पक्ष द्वारा अभियुक्त के विरूद्ध लगाये गये आरोपों को साबित करने के लिये कुल 9 गवाहान को परीक्षित करवाया गया तथा 76 दस्तावेज प्रदर्शित करवाये गये।
अभियुक्त को धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत परीक्षित किया गया, जिसमें अभियुक्त ने स्वयं को निर्दोष होना बताते हुए कथन किया कि उसकी मृतक से कोई नाराजगी व रंजिश नहीं थी एवं उसे इस प्रकरण में झूठा फंसाया गया है। अभियुक्त की ओर से कोई साक्ष्य सफाई पेश नहीं की गई, किन्तु 3 दस्तावेजात को प्रदर्शित करवाया गया।
विचारण न्यायालय ने विद्वान् लोक अभियोजक तथा अभियुक्त के अधिवक्ता की बहस सुनने के पश्चात् अपने निर्णय एवं दण्डादेश दिनाँक 01.12.2012 द्वारा अभियुक्त परमजीतसिंह उर्फ पम्मा को धारा 302, 201, 394 भारतीय दण्ड संहिता के अपराध में दोषसिद्ध मानते हुये उपरोक्तानुसार दण्डित किये जाने का आदेश दिया, जिसके विरूद्ध यह अपील प्रस्तुत की गई है।
अपीलार्थी/अभियुक्त के विद्वान् अधिवक्ता एवं विद्वान् लोक अभियोजक की बहस सुनी गयी तथा पत्रावली का अवलोकन किया गया।
अभियुक्त के विद्वान् अधिवक्ता द्वारा विचारण न्यायालय के निर्णय दिनाँकित 01.12.2012 को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि विचारण न्यायालय ने पत्रावली पर आयी साक्ष्य का भली प्रकार से मूल्यांकन न कर अभियुक्त को आरोपित अपराध के लिये दोषी ठहराने में त्रुटि की है। उनका तर्क रहा कि अभियोजन द्वारा अभियुक्त से जो बरामदगी बताई गई है वह सभी बनावटी व झूठी है तथा उन्हें साबित करने के लिये किसी भी स्वतंत्र व्यक्ति को मौतबिर नहीं बनाया गया है। मृतक के दो भाईयो के समक्ष ही समस्त बरामदगी की फर्दात तैयार की गई जो कि पूर्ण रूप से हितबद्ध साक्षी है जिनके कथनों पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। उनका यह भी तर्क था कि स्वतंत्र साक्षी रामदास, जिसने अभियुक्त के घर में स्थित कुई से एक बटुआ, कापा, कपड़े, बटुवे के अन्दर दो फोटो, एक आयकर कार्ड, एक ए.टी.एम. कार्ड पंजाब नेशनल बैंक, एक शोपिंग कार्ड, एक मोबाईल एम.टी.एस. कम्पनी जिसमें सिम व बैटरी थी, अलग से 13 सिम कुई से निकाले, जिनका उल्लेख बरामदगी प्रदर्श पी.18 में हैं, को अभियोजन द्वारा साक्ष्य में पेश नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त उनका तर्क था कि अभियुक्त के कपड़े, अपराध में प्रयुक्त हथियार कापा पर मृतक का खून विद्यमान होना बताया गया है किन्तु यह संभव नहीं है कि कुई में पानी व कीचड़ में कोई भी वस्तु लम्बे समय तक पड़ी रहे और उन पर जाँच किये जाने योग्य खून सुरक्षित रह जाये। उनका यह भी तर्क रहा कि मृतक के कपड़ों पर भी उसका खून होना बताया गया है किन्तु मृतक की लाश नहर में बहकर आई और सड़-गल गई और बदबू देने लगी थी, ऐसे हालात मेंं उसके कपड़ों पर खून के निशान बने रहना संभव नहीं है। उनका यह भी आक्षेप था कि अभियोजन द्वारा प्रदर्श पी.15 नक्शा-मौका व घटनास्थल निरीक्षण में मार्क ए व बी पर खून होना बताया गया है किन्तु इस फर्द से पूर्व ही दिनाँक 31.05.2011 को पुलिस द्वारा इसी स्थान का निरीक्षण किया था उस समय कोई खून आदि घटनास्थल पर नहीं पाया गया। अतः स्पष्ट है कि प्रदर्श पी.15 व प्रदर्श पी.15ए पर जो खून पाया जाना बताया गया है वह बनावटी व झूठा है।
उनका तर्क रहा कि यह स्वाभाविक नहीं है कि अभियुक्त मृतक की मूल्यहीन तथा व्यर्थ वस्तुओं को अपने साथ रखेगा। अभियोजन की ओर से पेश की गई साक्ष्य से यह साबित नहीं होता है कि मोबाईल नंबर 9667610861 मृतक का तथा मोबाईल नंबर 8890557708 अभियुक्त का हो। विचारण न्यायालय द्वारा इन मोबाईल नंबरों की कॉल डिटेल पर विश्वास करके त्रुटि की गई। अभियोजन द्वारा ऐसी कोई साक्ष्य पेश नहीं की गई कि मृतक की हत्या कर नहर में जहाँ फेंकना बताया गया है, उस स्थान पर वह किस प्रकार से आया। मृतक के कपड़े घटना से करीब 13 दिन पश्चात् जब्त किये गये हैं उन पर खून पाया जाना संदिग्ध है। अभियुक्त को इस अपराध से जोड़ने के लिये परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला की कड़ी इस प्रकार से जुड़ी हुई होनी चाहिए कि जिससे एक मात्र यही निष्कर्ष निकलता हो कि अभियुक्त द्वारा ही अपराध कारित किया गया है किन्तु इस प्रकरण में अभियोजन ऐसी परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश नहीं कर सका है। अभियुक्त का मृतक को मारने का कोई हेतुक भी नहीं बताया गया है। उनका यह भी तर्क है कि धारा 394 भारतीय दण्ड संहिता के अपराध में अभियुक्त को दोषसिद्ध करने के लिए कोई साक्ष्य पत्रावली पर मौजूद नहीं है, विचारण न्यायालय ने उक्त अपराध के लिये भी दोषसिद्ध किया गया है, अतः उन्होंने अपील स्वीकार कर अपीलार्थी-अभियुक्त को दोषमुक्त किये जाने की प्रार्थना की।
इसके विपरीत विद्वान् लोक अभियोजक ने उनके तर्कों का विरोध करते हुए विचारण न्यायालय के निर्णय को पत्रावली पर आई साक्ष्य के अनुरूप होना बताते हुये विचारण न्यायालय के निर्णय में कोई हस्तक्षेप करने का आधार नहीं होना बताया तथा अपील अस्वीकार किये जाने की प्रार्थना की। उनका यह भी तर्क था कि अभियुक्त को अभियोजन साक्षीगण द्वारा बिना किसी कारण क्यों आरोपित किया जायेगा, ऐसा कोई कारण अभियुक्त की ओर से नहीं उठाया गया। अतः उन्होंने अपील खारिज किये जाने की प्रार्थना की।
उभय पक्षकारान के तर्कों पर मनन किया गया तथा पत्रावली का अवलोकन किया।
पत्रावली के अवलोकन से प्रकट होता है कि अभियोजन केस चश्मदीद साक्ष्य के बजाए परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर ही आधारित है। अभियोजन द्वारा अभियुक्त के विरूद्ध लगाये गये आरोपों को साबित करने के लिए निम्नलिखित परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश की हैः-
दिनाँक 29.05.2011 को अभियुक्त द्वारा मृतक से मोबाईल फोन पर बातचीत की गई थी।
अभियुक्त की गिरफ्तारी के बाद अभियुक्त ने जरिये सूचना (प्रदर्श पी.70) उस स्थान को चिन्हित किया, जहाँ पर मृतक की हत्या कर उसे नहर में फेंका गया। उस स्थान पर मृतक का खून पाया गया, जिसका उल्लेख फर्द प्रदर्श पी.14 में है।
अभियुक्त की सूचना के आधार पर उसके मकान से अभियुक्त का मोबाईल फोन और मोटरसाईकिल यामाहा बरामद हुई (प्रदर्श पी.16)
अभियुक्त की सूचना (प्रदर्श पी.72) के आधार पर अभियुक्त के मकान में स्थित कुई में से मृतक नरेश कुमार की वस्तुएँ यथा एक बटुआ, बटुवे के अन्दर दो फोटो, एक आयकर कार्ड, एक एटीम कार्ड पंजाब नेशनल बैंक, एक शोपिंग कार्ड, एक मोबाईल एमटीएस कम्पनी जिसमें सिम व बैटरी थी, अलग से 13 सिम आदि बरामद हुई, जिनका उल्लेख प्रदर्श पी.18 में है, साथ ही इसी कुई में से अभियुक्त के खून आलूदा वस्त्र एवं हत्या में प्रयुक्त हथियार कापा जिस पर भी खून लगा था, बरामद किये गये।
एफ.एस.एल. द्वारा बाद जाँच रिपोर्ट प्रदर्श पी.73 जारी की गई, जिसके अनुसार अभियुक्त व मृतक के कपड़ों व अपराध में प्रयुक्त हथियार कापा पर मृतक नरेश कुमार का खून होना पाया गया। न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह है कि क्या उक्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर अभियुक्त के विरूद्ध लगाये आरोप साबित होते हैं?
अभियोजन के अनुसार मृतक नरेशकुमार दिनाँक 29.05.2011 को शाम साढ़े आठ बजे धर्मपाल (पी.डब्ल्यू.4) की दुकान पर आया था उसका कथन है कि उसके बाद नौ-साढ़े नौ बजे यामाहा मोटरसाईकिल आई, जिस पर दो लड़के सवार थे तथा उनके साथ नरेश कुमार बैठकर चला गया। पी.डब्ल्यू.2 गोकलचन्द के अनुसार भी मृतक दिनाँक 29.05.2011 को शाम साढ़े छः बजे घर पर आ गया था और घर से चाय पीकर घर के आगे मोबाईल पर बाते करते-करते अपने मामा धर्मपाल (पी.डब्ल्यू.4) के दुकान पर चला गया था। वह भी सौदा लेने मामा की दुकान पर गया था जहाँ पर उसने मृतक नरेश कुमार को अपने मामा की दुकान पर ही बैठा हुआ देखा था, अतः इस प्रकार मृतक दिनाँक 29.05.2011 को नौ-साढ़े नौ बजे रात्रि तक धर्मपाल की दुकान पर मौजूद था, वहाँ से दो लड़कों के साथ यामाहा मोटरसाईकिल पर बैठकर चला गया था। मृतक के जाने के करीब दो दिन बाद उसकी गुमशुदगी बाबत् रिपोर्ट प्रदर्श पी.12 दिनाँक 01.06.2011 को उसके भाई चरणदास व गोकलचन्द (पी.डब्ल्यू.2) द्वारा दर्ज करवाई गई, जिसमें इस बात का उल्लेख नहीं है कि मृतक दिनाँक 29.05.2011 को पी.डब्ल्यू.4 धर्मपाल की दुकान पर गया था जहाँ से वह दो लड़कों के साथ यामाहा मोटरसाईकिल पर बैठकर चला गया था। मृतक नरेश कुमार की गुमशुदगी के सम्बन्ध में यह तथ्य बहुत ही महत्वपूर्ण है और यह तथ्य पी.डब्ल्यू.2 गोकलचन्द की जानकारी में भी था तथापि पी.डब्ल्यू.2 गोकलचन्द द्वारा इस बाबत् कोई उल्लेख नही किया हैं। गुमशुदगी रिपोर्ट प्रदर्श पी.12 में उल्लेख है कि मृतक रात को 8 बजे घर से बिना बताये चला गया था। अतः मृतक का पी.डब्ल्यू.4 धर्मपाल की दुकान पर जाना और वहाँ से दो व्यक्तियों के साथ जाना संदिग्ध हो जाता है। प्रदर्श पी.12 गुमशुदगी रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख नहीं है कि मृतक लाल रंग की लाइनदार शर्ट व काले रंग की पेंट पहन कर गया था। इसके अतिरिक्त यह भी स्पष्ट नहीं हो सका है कि मृतक किन दो व्यक्तियों के साथ मोटर साईकिल पर बैठकर गया था और वहाँ से घटनास्थल (प्रदर्श पी.15) पर कैसे पहुँचा। पी.डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री ने स्वीकार किया है कि तफ्तीश के दौरान ऐसा कोई चश्मदीद साक्षी नहीं मिला जिसने नरेश कुमार को अभियुक्त के साथ घटनास्थल की ओर जाते हुये अन्तिम बार देखा हो। उसने यह भी स्वीकार किया है कि तफ्तीश में यह नहीं आया कि नरेश कुमार घटनास्थल पर किस प्रकार पहुँचा।
दिनाँक 31.05.2011 को मृतक के कपड़े जरिये फर्द प्रदर्श पी.4 जब्त किये गये, उस समय उन कपड़ों पर खून के निशानात होना नहीं बताया गया, जबकि उन्हीं कपड़ों को दिनाँक 13.06.2011 को जरिये फर्द प्रदर्श पी.20 सील मोहर किये गये तो उन पर मामूली खून होने बाबत् उल्लेख किया गया। जब मृतक नहर में बहकर आया तो उसके कपड़ों पर खून के निशानात होना स्वाभाविक प्रतीत नहीं होता हैं, इसी कारण प्रदर्श पी.4 में भी खून के निशानात होने का कोई उल्लेख नहीं है। पी.डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री के अनुसार लाश 5 दिन पुरानी लग रही थी, अतः एफ.एस.एल. रिपोर्ट प्रदर्श पी.73 के अनुसार मृतक के कपड़ों पर खून होना, अनुसंधान अधिकारी के आचरण को संदिग्ध बना देता है।
मृतक की हत्या की घटना दिनाँक 29.05.2011 के पश्चात् एवं दिनाँक 31.05.2011 के बीच किसी समय हुई थी। अभियुक्त के गिरफ्तार होने के बाद उसके द्वारा दी गई सूचना (प्रदर्श पी.13) के अनुसरण में अनुसंधान अधिकारी द्वारा घटनास्थल का निरीक्षण दिनाँक 09.06.2011 को किया और जिसकी फर्द प्रदर्श पी.15 बनायी गई। प्रदर्श पी.15 को देखने से स्पष्ट है कि स्थान मार्क "A" व "B" पर खून पड़ा होना बताया गया है। स्थान "A" व "B" जहाँ खून पड़ा होना बताया गया है वह पुल 14एफ.एफ. है। पी.डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री, अनुसंधान अधिकारी ने स्वीकार किया है कि घटनास्थल जहाँ हत्या की गई, वह रास्ता आम व पक्की सड़क है और वहाँ आवागमन चलता रहता है, अतः दिनाँक 29.05.2011 व दिनाँक 31.05.2011 के बीच जिस समय भी मृतक की हत्या की गई, उस समय से दिनाँक 09.06.2011 तक पक्की सड़क पर आवागमन होने की स्थिति में सड़क व ईंट पर खून दिखाई देना और उसे उठाना स्वाभाविक प्रतीत नहीं होता है। इतनी समयावधि में खून के विघटन (disintegration) होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई साक्ष्य नहीं है जिससे मृतक की हत्या उस स्थान पर होना साबित हो।
अभियोजन की ओर से अभियुक्त का इस प्रकरण में लिप्त होने बाबत् एक परिस्थिति यह भी बताई गई है कि अभियुक्त को गिरफ्तार करने के बाद अभियुक्त द्वारा दी गई सूचना अंतर्गत धारा 27 साक्ष्य अधिनियम (प्रदर्श पी.72) के अनुसरण में अभियुक्त के मकान में स्थित कुई से एक बटुआ, कापा, कपड़े, बटुवे के अन्दर दो फोटो, एक आयकर कार्ड, एक एटीम कार्ड पंजाब नेशनल बैंक, एक शोपिंग कार्ड, एक मोबाईल एमटीएस कम्पनी जिसमें सिम व बैटरी नहीं थी, अलग से 13 सिम कुई से बरामद हुए, जिनका उल्लेख बरामदगी प्रदर्श पी.18 में हैं। उक्त सामान रामदास के द्वारा निकाले गये, जिन्हें रामदास से ही साफ करवाया गया। अभियुक्त से की गई उक्त बरामदगी के सम्बन्ध में पेश की गई साक्ष्य पर विचार किया जावे तो पी.डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री, अनुसंधान अधिकारी ने कथन किया है किः-
"परमजीत के घर जब बरामदगी की कार्यवाही की तब गांव के काफी लोग इकट्ठे हो गये थें। यह सही है कि मैंने वहा भी आस पड़ौसी को गवाह नहीं रखा। कुई से सामान बाहर निकालने में रामदास को जब रस्सी से बाल्टी द्वारा कुई में प्रवेश करवाया तो सामान लेकर उपर आने में उसे आधा घंटा लग गया था। यह सही है कि मैंने जितनी भी बरामदगीया की है उसमें परिवादी पक्ष के चरणदास व गोकुलचन्द को ही मौतबीर गवाह रखा है। चरणदास व गोकलचन्द लाश मिलने से लेकर बरामदगी होने तक थाना में नहीं रहे थें अज खुद कहा कि आते जाते रहते थें। दोनों व्यक्ति प्रतिदिन थाना पता करने के लिए आते थें। यह सही है कि प्रतिदिन आते थे इसलिए उनको मौतबीर रखते गये।"
"यह सही है कि बरामदा सफेद रंग का नोकिया मोबाईल मृतक नरेश कुमार का हो, ऐसी कोई साक्ष्य पत्रावली पर नहीं है। सफेद रंग का नोकिया मोबाईल अपराध में काम में नहीं लिया गया क्योंकि उसमें सिम नहीं थी कुई से बरामदा कपड़े मुलजिम के होने बाबत् किसी अड़ौसी पड़ौसी व उसके घर वालों ने नहीं बताया।"
पी.डब्ल्यू.2 गोकलचन्द ने भी इस सम्बन्ध में कथन किया है किः-
"कुई से लेंटर हटा कर कुई से गैस निकाली थी। कुई के अन्दर रामदास के रस्सा बान्धकर नीचे कुई में लटकाते थें वह अन्दर से सामान निकालकर लाता तब उपर ख्ेच लेते थे इस प्रकार से उसको कई बार कुई के अन्दर लटका कर भेजा और कई बार उपर खेंचा तब सामान की बरामदगी हुई। यह सही है कि कुई के अन्दर से पारचात, कापा, मोबाईल आदि निकाले तो उनके गन्दगी लगी हुई थी। बटुए के भी गन्दगी लगी हुई थी। उपरोक्त सामान को बाहर निकालने के बाद रामदास से थानेदार जी ने पानी से व गिले कपड़े से साफ करवाया। फिर सब को अलग अलग सील मोहर किया।''
उपरोक्त गवाहान के कथनों से स्पष्ट होता है कि :-
(i) अभियुक्त की सूचना के आधार पर जिस कुई से एक बटुवा, कापा, कपड़े, बटुवा के अन्दर दो फोटो, एक आयकर कार्ड, एक एटीम कार्ड पंजाब नेशनल बैंक, एक शोपिंग कार्ड, एक मोबाईल एमटीएस कम्पनी जिसमें सिम व बैटरी थी, अलग से 13 सिम इत्यादि निकाली गई थी उसमें पानी व कीचड़ था, अतः उन वस्तुओं के एक लम्बे समय तक कुई में पड़े रहने से उन वस्तुओं पर खून विद्यमान रह पाना स्वाभाविक प्रतीत नहीं होता है। इस न्यायालय द्वारा डी'.बी.क्रिमीनल अपील सं.56/2012 राणसिंह बनाम राजस्थान राज्य के निर्णय दिनाँक 20.02.2019 में ऐसी ही परिस्थितियों में अवधारित किया है किः-
"Since, the axe was lying submerged in a septic tank, the possibility of the same retaining any trace of blood was negligible more-so because the axe was apparently thrown away by the accused just after the incident and the fresh blood stains if any would definitely have got dissolved/disintegrated in the filthy water of the septic tank."
(ii) कुई से उक्त समस्त वस्तुओं को निकालने के सम्बन्ध में किसी भी स्थानीय गवाहान को मौतबिर नहीं बनाया गया। हालांकि पी. डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री, अनुसंधान अधिकारी ने स्वीकार किया है कि वहाँ गांव के काफी लोग इक्ट्ठे हो गये थे यहाँ तक कि रामदास जिसके द्वारा कुई में से बरामदशुदा वस्तुएँ निकाली गई थी उसको भी अभियोजन द्वारा पेश नहीं किया गया और न ही लिस्ट गवाहान में उसका नाम अंकित है।
(iii) कुई से निकाली गई मृतक की वस्तुओं को अन्वीक्षा के दौरान न्यायालय के समक्ष पी.डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री के परीक्षण के समय पेश कर प्रदर्शित करवाया गया है किन्तु उन वस्तुओं को यथा एक बटुवा, कापा, कपड़े, बटुवा के अन्दर दो फोटो, एक आयकर कार्ड, एक एटीम कार्ड पंजाब नेशनल बैंक, एक शोपिंग कार्ड, एक मोबाईल एमटीएस कम्पनी जिसमें सिम व बैटरी थी, अलग से 13 सिम, कड़ा इत्यादि मृतक की ही थी, इनकी पहचान मृतक के भाई पी.डब्ल्यू.2 गोकलचन्द से नहीं करवायी और न ही दौराने अनुसंधान उक्त वस्तुओं के सम्बन्ध में कोई शिनाख्तगी कार्यवाही ही करवाई गई। पी.डब्ल्यू.2 गोकलचन्द ही न्यायालय के समक्ष उक्त बरामदशुदा वस्तुओं को पहचान कर यह कथन कर सकता था कि बरामदशुदा वस्तुएंँ जिनमें मृतक के कपड़े, कड़ा, ए.टी.एम. कार्ड, फोटो भी सम्मिलित है, वास्तव में मृतक के ही है। इस न्यायालय द्वारा डी.बी.क्रिमीनल अपील सं.472/2017 सन्नी उर्फ नरेश बनाम राजस्थान राज्य के निर्णय दिनाँक 18.07.2019 में अवधारित किया है किः-
"As we have already discussed above, the bag was not got identified by the parents of the deceased in their evidence and thus, there is no substantive evidence on the record to show that the bag, which was recovered at the instance of the accused Sunny @ Naresh, was actual that of the deceased child."
इसके अतिरिक्त बरामदशुदा वस्तुएँ मृतक की होने बाबत् पहचान के सम्बन्ध में अभियुक्त के अधिवक्ता पी.डब्ल्यू.2 गोकलचन्द से जिरह करने से भी वंचित रहे हैं। इस प्रकार अभियुक्त का केस विपरीत रूप से प्रभावित हुआ है।
(iv) यह मानवीय स्वभाव के विपरीत है कि अभियुक्त मृतक की पहचान साबित करने वाली महत्वहीन वस्तुओं को अपने साथ लाकर अपने मकान में रखेगा, जो कि बाद में चलकर उसके विरूद्ध सबूत के रूप में काम में ली जावे। अतः अभियुक्त का उन वस्तुओं को लाकर अपने घर में छुपाना और उसकी सूचना के अनुसरण में बरामद होना संदिग्ध प्रतीत होता है।
जहाँ तक अभियुक्त की सूचना प्रदर्श पी.72 के आधार पर उसके मकान से मृतक का सफेद मोबाईल व मोटरसाईकिल प्रदर्श पी.16 बरामद होने का प्रश्न है। मोटरसाईकिल तो स्वयं अभियुक्त की ही है उसकी बरामदगी से अभियुक्त को किसी प्रकार से इस प्रकरण से नहीं जोड़ा जा सकता है। जहाँ तक मोबाईल का प्रश्न है इस सम्बन्ध में न तो शिनाख्तगी परेड करवाई गई और न ही विचारण के समय पी.डब्ल्यू.2 गोकलचन्द के बयान के दौरान न्यायालय में उक्त वस्तुएँ पेश कर उसकी पहचान ही करवाई गई है। पी.डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री ने स्वीकार किया है कि बरामदशुदा सफेद रंग का नोकिया मोबाईल मृतक का हो, ऐसी कोई साक्ष्य पत्रावली पर नहीं है। अतः फर्द प्रदर्श पी.16 के द्वारा अभियुक्त के मकान से बरामद मोटरसाईकिल व मोबाईल अभियुक्त को इस प्रकरण से नहीं जोड़ा जा सकता है।
यह स्वीकृत है कि अभियुक्त द्वारा मृतक को जान से मारने का कोई हेतुक (डवजपअम) नहीं था। पी.डब्ल्यू.2 गोकलचन्द के कथन के मुताबिक वह लोग पूर्व में अभियुक्त के गांव में ही रहते थे तब अभियुक्त के परिवार से उनके अच्छे सम्बन्ध थे। उसके बाद उनके बीच सम्बन्धों में कोई कड़वाहट आई हो, ऐसा नहीं बताया गया है। ऐसी स्थिति में मृतक द्वारा अभियुक्त के साथ घटना से पूर्व फोन पर बात करना माना भी जावे तो उसके कारण अभियुक्त को मृतक की हत्या से नहीं जोड़ा जा सकता है। अभियुक्त व मृतक की कॉल डिटेल प्रदर्श पी.65 से प्रदर्श पी.68 से स्पष्ट है कि अभियुक्त व मृतक के द्वारा एक-दूसरे को फोन करने के अतिरिक्त अन्य लोगों को भी फोन किये गये थे।
अभियोजन के केस का विश्लेषण करने से निम्नलिखित तथ्य प्रकट होते हैंः-
अभियुक्त द्वारा मृतक की हत्या करने का कोई हेतुक (डवजपअम)नहीं था।
अभियुक्त व पी.डब्ल्यू.2 गोकलचन्द की आपस में जान पहचान थी और उनके अच्छे सम्बन्ध थे।
मृतक को अंतिम बार अभियुक्त के साथ देखा गया हो, ऐसी कोई साक्ष्य नहीं है।
अभियुक्त से बरामदशुदा वस्तुओं को मृतक की होना अभियोजन द्वारा विधिक साक्ष्य के द्वारा साबित नहीं करवाया गया है।
यदि क्षण भर के लिये बरामदशुदा वस्तुओं को मृतक की होना मान भी लिया जाये तो भी यह मानवीय स्वभाव से परे हैं कि अभियुक्त इन वस्तुओं को, जो कि उसके लिये महत्वहीन थी, को अपने ही घर में छुपाकर रखेगा ताकि वह आगे चलकर उसके विरूद्ध सबूत के तौर पर इस्तेमाल की जा सके।
अभियुक्त से बरामदगी के समय किसी स्वतंत्र व्यक्ति को साक्षी नहीं बनाया गया है।
मृतक के कपड़ों को 13दिन बाद सील किया गया। 24. प्रकरण के अनुसंधान के दौरान प्रारम्भ से अंत तक पी. डब्ल्यू.2 गोकलचन्द को प्रत्येक बरामदगी में साक्षी बनाया गया है, उसके भाई श्री चरणदास को लिस्ट गवाहान में गवाह बताया गया है किन्तु उसे पेश नहीं किया गया है। अभियुक्त के मकान से वस्तुओं की बरामदगी के समय उपस्थित व्यक्तियों अथवा स्थानीय व्यक्तियों को मौतबिर नहीं बनाया गया है। यहाँ तक कि रामदास जिसके द्वारा स्वीकृत रूप से कुई में से मृतक से संबंधित वस्तुओं को निकाला गया था, को भी न तो साक्षीगण की सूची में रखा गया और न ही न्यायालय में ही पेश किया है। यह सही है कि प्रत्येक प्रकरण में स्वतंत्र साक्षी होना आवश्यक नहीं है किन्तु जहाँ अभियुक्त के विरूद्ध अपराध को साबित करने के लिए पेश की गयी साक्ष्य संदिग्ध प्रतीत हो, वहाँ न्यायालय स्वतंत्र साक्षी की सम्पुष्टि के बाद ही ऐसी साक्ष्य पर विश्वास कर सकता है। पी.डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री ने स्वीकार किया है कि उसने जितनी भी बरामदगियाँ की है उनमें मृतक के भाई चरणदास व गोकलचन्द को ही मौतबिर गवाह रखा गया। गवाह के अनुसार वे दोनों लाश के मिलने से बरामदगी तक थाना में नहीं रहे थे, परन्तु आते जाते रहते थें। दोनों व्यक्ति प्रतिदिन थाना पर पता करने आते थे। प्रतिदिन आते थे इसलिये उनको मौतबिर रखते गये। पी.डब्ल्यू.9 विष्णु खत्री द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया किसी प्रकार से विधि के अनुरूप नहीं मानी जा सकती है और उससे अनुसंधान दूषित हो जाता है।
उपरोक्त परिस्थितियों में जब अभियुक्त की सूचना के आधार पर की गई बरामदगियाँ ही संदिग्ध है तो एफ.एस.एल. रिपोर्ट प्रदर्श पी.73 से भी अभियोजन को कोई लाभ नहीं मिलता है।
अतः उपरोक्त विवेचन के आधार पर अभियोजन द्वारा पेश की गई साक्ष्य संदिग्ध एवं कमजोर होने के कारण विश्वास किये जाने योग्य नहीं है। ऐसी साक्ष्य के आधार पर अभियुक्त को हत्या जैसे गम्भीर अपराध हेतु दोषसिद्ध किया जाना सुरक्षित नहीं है।
अतः उपरोक्त विवेचन के आधार पर अभियुक्त के विरूद्ध आरोपित अपराध युक्तियुक्त संदेह से परे साबित नहीं होने से वह संदेह का लाभ प्राप्त करने का अधिकारी है और अभियुक्त परमजीत सिंह उर्फ पम्मा को आरोपित अपराधों में संदेह का लाभ देते हुये दोषमुक्त किया जाता है। फलतः अपील स्वीकार किये जाने योग्य होने से अपील स्वीकार की जाती है और विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय एवं दण्डादेश दिनाँक 01.12.2012 को अपास्त किया जाता है। अतः अभियुक्त यदि किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उसे तुरन्त प्रभाव से रिहा किया जावे।
अभियुक्त को यह आदेश दिया जाता है कि वह धारा 437(क) दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत पचास हजार रूपये की जमानत व इसी कदर राशि का मुचलका इस आशय का प्रस्तुत करें कि वह इस प्रकरण के निर्णय के विरूद्ध अपील प्रस्तुत होने पर अपील न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो जायेगा।
