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Judgment
अभय चतुर्वेदी द्वारा, न्यायाधिपति
यह अपील न्यायालय अपर सेशन न्यायाधीश, सुजानगढ़ जिला चूरू द्वारा सेशन प्रकरण संख्याः 19/2011 में पारित निर्णय एवं दण्डादेश दिनाँकित 28.09.2013 के विरूद्ध प्रस्तुत की गई है, जिसके द्वारा न्यायालय ने अपीलार्थी/अभियुक्त (जिसे आगे अभियुक्त के नाम से सम्बोधित किया जावेगा) को अपराध अंतर्गत धारा 302, 201 भारतीय दण्ड संहिता के अपराधों में दोषसिद्ध किया जाकर निम्न प्रकार से दण्डित किये जाने का आदेश दिया :-
नाम
अपराध धारा
सजा व जुर्माना
अदम अदायगी जुर्माना
बाबूलाल
302भा.दं.सं.
आजीवन कारावास एवं
5000/-रूपये जुर्माना
एक माह का
अतिरिक्त कारावास
201भा.दं.सं.
सात वर्ष के सश्रम
कारावास एवं
1000/-रूपये जुर्माना
सात दिवस का
अतिरिक्त कारावास
प्रकरण से संबंधित तथ्य संक्षिप्त में इस प्रकार है कि दिनाँक 24.08.2011 को पी.डब्ल्यू.4 मोहम्मद आरिफ द्वारा एक लिखित रिपोर्ट पुलिस थाना छापर (चूरू़) में इस आशय की पेश की गई कि दिनाँक 31.07.2011 को उसका भाई परवेज गुम हुआ था जिसे उसी दिन आखिरी बार अभियुक्त बाबूलाल के साथ देखा गया था। परवेज की गुमशुदगी रिपोर्ट उसने थाने में दर्ज करवाई थी। दिनाँक 24.08.2011 को उसके ताऊ के लड़के नदीम (पी.डब्ल्यू.2) ने उसे बताया कि अभियुक्त बाबूलाल ने परवेज को उसी दिन यानि दिनाँक 31.07.2011 को मारकर बीदासर में ही कहीं दबा दिया, यह बात उसे (नदीम को) अभियुक्त बाबूलाल ने बतायी है। नदीम ने जिस समय यह बात उसे कही, उस समय उसके पास उसके ताऊ का लड़का यूसुफ (पी.डब्ल्यू.3) भी उपस्थित था। उसे पूरा विश्वास है कि उसके भाई परवेज उम्र 10वर्ष को अभियुक्त बाबूलाल ने मारकर कहीं दबाया है।
इस रिपोर्ट के आधार पर पुलिस थाना छापर (चूरू) में प्रथम सूचना रिपोर्ट संख्याः 92/2011 अपराध अंतर्गत धारा 302, 201 भारतीय दण्ड संहिता दर्ज हुई तथा पी.डब्ल्यू.12 पुष्पेन्द्र झाझड़िया द्वारा अनुसंधान प्रारम्भ किया गया।
दौराने अनुसंधान, अनुसंधान अधिकारी द्वारा अभियुक्त को जरिये फर्द प्रदर्श पी.23 गिरफ्तार किया गया। अभियुक्त द्वारा अनुसंधान अधिकारी को अंतर्गत धारा 27 साक्ष्य अधिनियम सूचना दी कि उसने मृतक परवेज को मारकर नेमीचन्द नाहटा बीदासर स्थित कुएँ परं बने कोठा में छुपा दिया था जो चलकर बता सकता हूँ, इस इत्तला को फर्द इत्तला प्रदर्श पी.24 के रूप में लेखबद्ध किया गया।
नेमीचन्द नाहटा के बीदासर स्थित कुएँ पर बने कोठा से एक नर कंकाल जब्त किया गया तथा फर्द सूरत हाल नर कंकाल मृतक परवेज प्रदर्श पी.5 तथा नक्शा मौका प्रदर्श पी.3 व हालात मौका प्रदर्श पी.3ए तैयार किये गये। तत्पश्चात् जब्त नर कंकाल का पंचनामा प्रदर्श पी.2 तैयार किया गया तथा नर कंकाल द्वारा पहनी हुई पेंट को जरिये फर्द प्रदर्श पी.6 जब्त किया गया। नर कंकाल का पोस्टमार्टम करवाया गया तथा तत्पश्चात् उसे जरिये फर्द सुपुर्दगी (प्रदर्श पी.7) क्रिया-कर्म हेतु उसके सगे भाई मोहम्मद आरिफ (पी.डब्ल्यू4) को सुपुर्द किया गया।
दौराने अनुसंधान मृतक के नर कंकाल से निकाली गई रेडियस एवं अलना हड्डी को डी.एन.ए. परीक्षण के लिये एफ.एस.एल.प्रयोगशाला को भेजा गया, साथ ही पी.डब्ल्यू.1 मुन्नीदेवी के रक्त का नमूना भी एफ.एस.एल.को भेजा गया। एफ.एस.एल.प्रयोगशाला द्वारा बाद जाँच, रिपोर्ट प्रदर्श पी.22 जारी की गई, जिसके अनुसार नर कंकाल पी.डब्ल्यू.1 मुन्नीदेवी का पुत्र होना बताया गया। दौराने अनुसंधान गवाहान के बयान अंतर्गत धारा 161 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत दर्ज किये गये तथा बाद अनुसंधान पुलिस द्वारा संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष अभियुक्त के विरूद्ध धारा 302, 201 भारतीय दण्ड संहिता के तहत चालान प्रस्तुत किया गया, जहाँ से कमिट होकर यह प्रकरण विचारण न्यायालय में प्राप्त हुआ।
विचारण न्यायालय द्वारा अभियुक्त के विरूद्ध धारा 302, 201 भारतीय दण्ड संहिता का आरोप विरचित कर सुनाया व समझाया गया तो अभियुक्त ने आरोप सुन, समझकर आरोपों को अस्वीकार किया और अन्वीक्षा चाही।
अभियोजन द्वारा अभियुक्त के विरूद्ध लगाये गये आरोपों को साबित करने के लिये कुल 13 गवाहान को परीक्षित किया गया तथा 25 दस्तावेजात प्रदर्शित करवाये गये।
अभियुक्त को धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत परीक्षित किया गया, जिसमें अभियुक्त ने स्वयं को निर्दोष होना बताते हुये उसके द्वारा कोई अपराध नहीं करने का कथन किया गया। अभियुक्त की ओर से कोई साक्ष्य सफाई पेश नहीं की गई।
विचारण न्यायालय ने विद्वान् लोक अभियोजक तथा अभियुक्त के अधिवक्ता की बहस सुनने के पश्चात् अपने निर्णय एवं दण्डादेश दिनाँकित 28.09.2013 के द्वारा अभियुक्त बाबूलाल को धारा 302, 201 भारतीय दण्ड संहिता के अपराध में दोषसिद्ध मानते हुये उपरोक्तानुसार दण्डित किये जाने का आदेश दिया गया जिसके विरूद्ध यह अपील प्रस्तुत की गई।
अभियुक्त के विद्वान् अधिवक्ता एवं विद्वान् लोक अभियोजक की बहस सुनी गई तथा पत्रावली का अवलोकन किया गया।
अभियुक्त के विद्वान् अधिवक्ता द्वारा विचारण न्यायालय के निर्णय दिनाँकित 28.09.2013 को चुनौती देते हुये तर्क दिया है कि विचारण न्यायालय ने पत्रावली पर आई साक्ष्य का भली प्रकार से मूल्यांकन नहीं कर अभियुक्त को आरोपित अपराध के लिये दोषी ठहराने में त्रुटि की है। उनका तर्क है कि अभियोजन का केस प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य के आधार पर न होकर पूर्णतया परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है। अभियोजन द्वारा अभियुक्त को मृतक के साथ अंतिम बार देखे जाने के सम्बन्ध में पी.डब्ल्यू.1 मुन्नीदेवी तथा पी.डब्ल्यू.4 मोहम्मद आरिफ को पेश किया गया है जिन्होंने स्वीकार किया है कि अभियुक्त का मृतक के साथ मृत्यु से पूर्व अंतिम बार देखे जाने के तथ्य का उल्लेख मृतक की गुमशुदगी रिपोर्ट में नहीं है, जो कि एक महत्वपूर्ण तथ्य होने के कारण उसमें अवश्य ही उल्लेखित होना चाहिये था। अतः अभियोजन द्वारा मृतक के साथ अंतिम बार अभियुक्त को देखे जाने की कहानी बाद में सोची-समझी होने के कारण स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है। उनका यह भी तर्क है कि दौराने अनुसंधान अभियुक्त द्वारा मृतक परवेज को मार कर नेमीचंद नाहटा के कुएँ बीदासर में बने कोठा में छुपा देने व उसे चल कर बरामद कराने के सम्बन्ध में सूचना अन्तर्गत धारा 27 साक्ष्य अधिनियम (प्रदर्श पी.24) दिया जाना बताया गया है किन्तु इस सूचना के अनुपालन में न तो अभियुक्त द्वारा लाश बरामद कराई गई और न ही इस बाबत् कोई फर्द ही बनाई गई। अतः अभियुक्त द्वारा दी गई सूचना महत्वहीन है। उनका तर्क है कि जो नर कंकाल दिनाँक 24.08.2011 को नक्शा मौका प्रदर्श पी.3 में बताये गये स्थान से बरामद होना बताया गया, वह वास्तव में मृतक परवेज का ही था, इस बाबत् भी निश्चयात्मक साक्ष्य नहीं है। मृतक की पहचान हेतु अभियोजन द्वारा विधि विज्ञान प्रयोगशाला द्वारा जारी डी.एन.ए. रिपोर्ट (प्रदर्श पी.22) को आधार बनाया गया है, किन्तु पत्रावली पर ऐसी कोई साक्ष्य नहीं है कि परवेज की माता श्रीमती मुन्नीदेवी (पी.डब्ल्यू.1) के रक्त का नमूना ही डी.एन.ए. जाँच हेतु भेजा गया था, अतः ऐसी स्थिति में डी.एन.ए. रिपोर्ट प्रदर्श पी.22 का कोई महत्व नहीं है। उनका यह भी तर्क है कि अभियुक्त द्वारा मृतक को जान से मारने का हेतुक (डवजपअम) भी नहीं बताया गया है। अभियुक्त द्वारा मृतक को मारने के सम्बन्ध में न्यायेतर संस्वीकृति (म्गजतं श्रनकपबपंस ब्वदमिेपवद) के सम्बन्ध में पी.डब्ल्यू.2 नदीम का कथन अस्वाभाविक, अस्पष्ट एवं अविश्वसनीय होने के कारण स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है, अतः उन्होंने उक्त आधारों पर अपील स्वीकार कर अभियुक्त को दोषमुक्त किये जाने की प्रार्थना की।
इसके विपरीत विद्वान् लोक अभियोजक ने उनके तर्कों का विरोध करते हुये विचारण न्यायालय के निर्णय को पत्रावली पर आई साक्ष्य के अनुरूप होना बताते हुये विचारण न्यायालय के निर्णय में कोई हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं होना बताया। उनका यह भी तर्क है कि अभियुक्त को अभियोजन साक्षीगण द्वारा बिना किसी कारण क्यों आरोपित किया जायेगा, ऐसा कोई कारण अभियुक्त की ओर से नहीं बताया गया है, अतः उन्होंने अपील खारिज किये जाने की प्रार्थना की।
उभय पक्षों के तर्कों पर मनन किया गया तथा पत्रावली का अवलोकन किया।
पत्रावली के अवलोकन से प्रकट होता है कि अभियोजन का केस चश्मदीद साक्ष्य पर आधारित न होकर परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है। अभियोजन द्वारा अभियुक्त के विरूद्ध लगाये गये आरोपों को साबित करने के लिए निम्नलिखित परिस्थितिजन्य साक्ष्य पेश की हैः-
दिनाँक 31.07.2011 को अभियुक्त के साथ मृतक को अंतिम बार देखा गया था।
अभियुक्त द्वारा पी डब्ल्यू.2 नदीम के समक्ष न्यायेतर संस्वीकृति की कि उसने परिवादी मोहम्मद आरिफ के भाई परवेज की हत्या कर उसे कहीं दबा दिया है।
अभियुक्त द्वारा धारा 27 साक्ष्य अधिनियम के तहत अनुसंधान अधिकारी को इस बाबत् सूचना दी कि उसने जिस स्थान पर मृतक की हत्या कर उसकी लाश को दबा दिया है उस स्थान पर चलकर लाश बरामद करवा सकता हूँ जिसका उल्लेख फर्द प्रदर्श पी.24 में है।
डी.एन.ए. की जाँच रिपोर्ट प्रदर्श पी.22 जारी की गई है जिसके आधार पर मृतक परवेज को मुन्नीदेवी का पुत्र बताया गया है।
न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह है कि क्या उक्त परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर अभियुक्त के विरूद्ध लगाये आरोप साबित होते हैं?
अभियोजन के अनुसार दिनाँक 31.07.2011 को परिवादी मोहम्मद आरिफ (पी.डब्ल्यू.4) ने भाई परवेज गुम होने की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस थाना छापर में दर्ज करवाई गई थी, किन्तु दिनाँक 31.07.2011 से 23.08.2011 तक पी.डब्ल्यू.4 मोहम्मद आरिफ के भाई परवेज के सम्बन्ध में कोई भी जानकारी नहीं मिली। परवेज के गुम होने के लगभग 24दिन पश्चात् दिनांक 24.08.2011 को पी.डब्ल्यू.4 मोहम्मद आरिफ द्वारा लिखित रिपोर्ट प्रदर्श पी.4 पुलिस थाना छापर में प्रस्तुत की, जिसमें सर्वप्रथम यह आरोप लगाया गया कि दिनाँक 31.07.2011 को परिवादी के भाई परवेज को आखिरी बार अभियुक्त बाबूलाल के साथ देखा गया था। पी.डब्ल्यू.1 श्रीमती मुन्नीदेवी ने अपने सशपथ कथन में कथन किया कि दिनाँक 31.07.2011 के दोपहर 2.00 बजे से उसका लड़का परवेज घर से खेलने के लिये निकला था वापिस शाम तक नहीं आया। उसने अपने लड़के को आखिरी बार अभियुक्त बाबूलाल सोलंकी के साथ देखा था। गवाह ने अपनी जिरह में स्वीकार किया है कि उसने अपने पुलिस बयान में यह बात नहीं बतायी थी कि जिस दिन परवेज गुम हुआ उसे आखिरी बार अभियुक्त बाबूलाल के साथ देखा गया था। इसी प्रकार पी.डब्ल्यू.4 मोहम्मद आरिफ ने कथन किया है कि उसने अपने भाई परवेज को अभियुक्त बाबूलाल के साथ दिनाँक 31.07.2011 को देखा था किन्तु उसने जिरह में स्वीकार किया है कि उसने गुमशुदगी की रिपोर्ट दिनाँक 31.07.2011 को ही लिखवाई थी किन्तु उस रिपोर्ट में यह बात नहीं लिखवाई थी कि उसने अभियुक्त बाबूलाल के साथ परवेज को अंतिम बार देखा था। अतः इस प्रकार स्पष्ट है कि परिवादी के भाई परवेज का अंतिम बार अभियुक्त के साथ होने के सम्बन्ध में जो कथन किये गये हैं वे महत्वपूर्ण विकास कर किये जाने के कारण विश्वसनीय नहीं है। यदि वास्तव में दिनाँक 31.07.2011 को परिवादी के भाई परवेज को अभियुक्त बाबूलाल के साथ अंतिम बार देखा होता और उसके बाद परवेज नहीं मिला था एवं इस सम्बन्ध में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी पी.डब्ल्यू.4 मोहम्मद आरिफ द्वारा पुलिस में दर्ज करवाई गई थी तो इस महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख गुमशुदगी की रिपोर्ट में भी होना चाहिये था तथा अभियुक्त से परिवादी द्वारा पूछताछ भी करनी चाहिये थी। पी. डब्ल्यू.1 मुन्नीदेवी ने पुलिस बयान में भी इस महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख नहीं किया है। ऐसी स्थिति में अभियुक्त बाबूलाल के साथ मृतक का अंतिम बार देखे जाने का तथ्य संदिग्ध होने तथा सुदृढ़ साक्ष्य से समर्थित नहीं होने के कारण स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है।
अभियुक्त के विरूद्ध आरोप साबित करने के लिये अभियोजन द्वारा दूसरी परिस्थिति यह बताई गई है कि अभियुक्त बाबूलाल ने पी.डब्ल्यू.2 नदीम के समक्ष इस आशय की न्यायेतर संस्वीकृति (म्गजतं श्रनकपबपंस ब्वदमिेपवद) की कि उसने दिनाँक 31.07.2011 को परवेज को मारकर कहीं छुपा दिया है। उक्त परिस्थिति के सम्बन्ध में, पत्रावली के अवलोकन से प्रकट होता है कि पी.डब्ल्यू.2 नदीम ने न्यायालय के समक्ष सशपथ कथन किया है कि उसके काका अब्दुल सलाम का लड़का परवेज दिनाँक 31.07.2011 को घर से गायब हो गया, उस दिन वह गाँव गया हुआ था। वह तथा बाबूलाल बम्बई व पूना घूमने गये थे तब बाबूलाल द्वारा बताया कि परवेज को दिनाँक 31.07.2011 को मारकर कहीं छुपा दिया है, बातों-बातों में उसे यह बता दिया। उसने वापिस आकर अपने काका के बेटे मोहम्मद आरिफ को व काका यूसुफ को यह बात बता दी। जिरह के दौरान उसने यह स्वीकार किया है कि इससे पहले वह बाबूलाल के साथ घूमने नहीं गया था। उसका अभियुक्त बाबूलाल से ज्यादा मेलजोल नहीं है। अभियुक्त बाबूलाल से उसकी दोस्ती बिल्कुल नहीं है। बाबूलाल उसे दिनाँक 13.08.2011 को मोहल्ले में स्थित इस्लामी मदरसे में मिला था, उसने कहा कि हम लोग बम्बई घूमने चलते हैं बाबूलाल ने घूमने के पैसे दिये थे क्योंकि उसने बाबूलाल से कहा था कि उसके पास पैसे नहीं है तो बाबूलाल ने कहा कि पैसे वह दे देगा। फिर वे 15 तारीख को घूमने निकले थे। उसने यह भी स्वीकार किया है कि जब वे घूमने गये तब वह मोबाईल साथ में लेकर गया था। वे 17 तारीख को बम्बई पहुँच गये थे वहाँ साबरी गेस्ट हाउस में रूके थे पूना एक दिन रूके थे, पूना से 23 तारीख को रात को आये थे। अभियुक्त बाबूलाल ने परवेज को मारने की बात बम्बई में कही थी। खाना खा रहे थे, उस वक्त कही थी उसके बाद दो दिन हम बम्बई रूके थे। उसे पहले कभी इस तरह की गुप्त बात उसने नहीं बतायी क्योंकि हम साथ नहीं रहे थे। पूना से आते ही वह अपने घर आकर सो गया। सुबह उठकर नमाज पढ़ने के लिये गया, तब वहाँ पर उसका काका यूसुफ व अब्दुल सलाम का लड़का मोहम्मद आरिफ उसे मदरसे के पास मिले तो उनको उसने यह बात बता दी। उसने रात में कोई टेलीफोन नहीं किया था।
पी.डब्ल्यू.2 नदीम के सशपथ कथनों के अवलोकन से स्पष्ट है कि पी.डब्ल्यू.2 नदीम का अभियुक्त बाबूलाल से ज्यादा मेलजोल नहीं था और न ही दोस्ती थी। इससे पहले पी.डब्ल्यू.2 नदीम अभियुक्त बाबूलाल के साथ कभी घूमने भी नहीं गया था और न ही ऐसी कोई गुप्त बात अभियुक्त बाबूलाल द्वारा उसे कभी बताई गई थी। स्वीकृत रूप से परिवादी का भाई परवेज पी.डब्ल्यू.2 नदीम के काका अब्दुल सलाम का पुत्र था ऐसी स्थिति में अभियुक्त बाबूलाल द्वारा ऐसे व्यक्ति के समक्ष न्यायेतर संस्वीकृति (म्गजतं श्रनकपबपंस ब्वदमिेपवद) किया जाना मानवीय स्वभाव के अनुकूल नहीं माना जा सकता है। यह भी बड़ा अस्वाभाविक प्रतीत होता है कि नदीम के पास खर्चे के लिये कोई पैसा नहीं होने के बावजूद भी अभियुक्त बाबूलाल उसे केवल घामाने के लिये बम्बई व पूना ले जायेगा, विशेषकर जबकि उनके कोई निकट संबंध नहीं हो। तर्क के लिये पी.डब्ल्यू.2 नदीम के कथन पर विश्वास किया भी जावे कि अभियुक्त बाबूलाल द्वारा उसके समक्ष न्यायेतर संस्वीकृति (म्गजतं श्रनकपबपंस ब्वदमिेपवद) की गई थी कि उसने परवेज को जान से मारकर दबा दिया गया है तो स्वाभाविक रूप से यह गवाह बम्बई से ही अपने मोबाइल के जरिये अपने काका के पुत्र पी.डब्ल्यू.4 मोहम्मद आरिफ को इस बाबत् अवश्य ही सूचित करता किन्तु इसके द्वारा ऐसा कोई प्रयास नहीं किया गया। ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी होने के बावजूद भी बम्बई और पूना में रूका रहा। अपने घर आकर वह सो गया और जब सुबह उठकर नमाज पढ़ने के लिये गया, वहाँ पर पी.डब्ल्यू.4मोहम्मद आरिफ व पी.डब्ल्यू.3यूसुफ मिले तो इस बात की जानकारी उसके द्वारा उन्हें दी गई। उसने स्वयं अपनी ओर से न तो बम्बई व पूना से और न ही अपने घर आकर अभियुक्त द्वारा उसे बताई गई महत्वपूर्ण बात परिवादी को बताई। अतः उसका आचरण मानवीय स्वभाव के विपरीत होने के कारण उसे विश्वसनीय साक्षी नहीं माना जा सकता है। जब पी.डब्ल्यू.2 नदीम का कथन ही विश्वसनीय नहीं है तो उसके बताये अनुसार पी.डब्ल्यू.3 यूसुफ का कथन भी विश्वसनीय नहीं माना जा सकता है, अतः अभियोजन द्वारा न्यायेतर संस्वीकृति (Extra Judicial Confession) के सम्बन्ध में जो साक्ष्य पेश की गई है, वह स्वीकार किये जाने योग्य नहीं है।
अभियोजन का यह भी केस रहा है कि अभियुक्त की गिरफ्तारी के बाद अभियुक्त द्वारा सूचना अन्तर्गत धारा 27 साक्ष्य अधिनियम इस आशय की दी कि उसने परवेज को मारकर नेमीचन्द नाहटा के कुएँ पर बने कोठा में छुपा दिया है जिसे साथ चलकर बता सकता हैं, जिसकी फर्द प्रदर्श पी.24 तैयार की गई। किन्तु उक्त सूचना की अनुपालना में अभियुक्त बाबूलाल द्वारा मृतक परवेज का कंकाल बरामद करवाया गया, ऐसी कोई फर्द अभियोजन द्वारा साक्ष्य में साबित नहीं करवायी गई। अतः ऐसी स्थिति में अभियुक्त द्वारा दी गई सूचना अंतर्गत धारा 27 साक्ष्य अधिनियम, उसके अनुसरण में बरामदगी के अभाव में महत्वहीन है और उसे अभियुक्त के विरूद्ध साक्ष्य के रूप में प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है।
पत्रावली पर उपलब्ध नक्शा मौका प्रदर्श पी.3 में बताये गये नेमीचन्द नाहटा के बीदासर स्थित कुएँ पर बने कोठा से जो कंकाल जब्त किया, उसकी स्थिति के संबंध में पत्रावली पर आयी साक्ष्य का अवलोकन करें तो प्रदर्श पी.5 फर्द सूरत हाल नर कंकाल में इस बात का उल्लेख है कि कंकाल के हाथ व पैरों की हड्डिया थी, सिर पर बाल आदि एवं नर कंकाल पर चमड़ी, माँस आदि नहीं था, खोपड़ी बीच में टूटी हुई थी। पी.डब्ल्यू.12 पुष्पेन्द्र झाझड़िया, अनुसंधान अधिकारी ने स्वीकार किया है कि कंकाल एक जगह पड़ा हुआ था लेकिन जैसे ही उठाया तो उसकी हड्डियाँ अलग-अलग हो गई। नर कंकाल को प्लास्टिक के कट्टे में डालकर बाहर निकाला था और प्लास्टिक के कट्टे में डालकर बीदासर अस्पताल लेकर गये थे। पी.डब्ल्यू.5 डॉ. राजेन्द्र कुमार गौड़, जो मेडिकल बोर्ड के एक सदस्य है जिसके द्वारा नर कंकाल का पोस्टमार्टम किया गया था, ने कथन किया है कि उसके पास कंकाल आया, उस समय कंकाल सील मोहर नहीं था। कंकाल की सारी हड्डिया अलग-अलग थी। कंकाल जुड़ा हुआ नहीं था। उनका कथन है कि वह नहीं बता सकता कि कितनी हड्डियाँ कंकाल में मौजूद थी व कितनी मिस थी।
अतः उपरोक्त साक्ष्य से स्पष्ट है कि नर कंकाल जो बरामद हुआ, उसकी हड्डिया अलग-अलग थी हाथों-पैरों की हड्डियाँ थी किन्तु नर कंकाल पर चमड़ी व माँस वगैरा नहीं था ऐसी स्तिथि में नर कंकाल परिवादी के भाई परवेज का ही था, पहचान पाना मुश्किल था। अभियोजन द्वारा नर कंकाल परिवादी के भाई परवेज का ही होने बाबत् डी.एन.ए. रिपोर्ट प्रदर्श पी.22 साक्ष्य में पेश की है जिसमें परवेज की माँ पी.डब्ल्यू.1 मुन्नीदेवी के रक्त के नमूने के मिलान होने के आधार पर कंकाल उसके पुत्र का होना बताया गया है किन्तु पी.डब्ल्यू.1 मुन्नीदेवी का रक्त का नमूना कब व किस व्यक्ति द्वारा लिया गया, इस बाबत् पत्रावली पर कोई साक्ष्य पेश नहीं की गई है। पी.डब्ल्यू.1 मुन्नीदेवी ने अपने बयान में यह कथन नहीं किया है कि उसके रक्त का कोई नमूना डी.एन.ए. जाँच हेतु लिया गया था। पी.डब्ल्यू.12 पुष्पेन्द्र झाझड़िया ने कथन किया है कि मृतक परवेज की मम्मी का रक्त सैम्पल किसी डाक्टर द्वारा लिया गया था। रक्त किस वस्तु से लिया गया था, उसे याद नहीं है। इसके अतिरिक्त न्यायालय के समक्ष किसी भी डाक्टर या अन्य व्यक्ति द्वारा यह कथन नहीं किया गया है कि उसके द्वारा पी.डब्ल्यू.1 मुन्नीदेवी के रक्त का नमूना लिया गया था। यदि लिया गया तो किसको सुपुर्द किया गया। इसके अतिरिक्त पी.डब्ल्यू.13 कृपालसिंह ने कथन किया है कि दिनाँक 01.09.2011 को एक रक्त सैम्पल मार्क ''बी'' मृतक परवेज की माता मुन्नीदेवी का गोपाललाल, कांस्टेबल ने राजकीय चिकित्सालय, बीदासर से लाकर जमा करवाया, जो उसने पूर्व के क्रमांक नंबर 4 पर दर्ज कर मालखाना में रखा। पी.डब्ल्यू.10 गोपाललाल ने यह कथन नहीं किया है कि वह मुन्नीदेवी का रक्त़ सैम्पल बीदासर से किस व्यक्ति से लेकर आया, न ही अभियोजन की ओर से प्रस्तुत किसी डाक्टर ने ही ऐसा कोई कथन किया है कि उसके द्वारा गोपाललाल को मुन्नीदेवी का रक्त सैम्पल दिया गया हो और न ही इस सम्बन्ध में कोई कथन अनुसंधान अधिकारी पी.डब्ल्यू.12 पुष्पेन्द्र झाझड़िया द्वारा ही किया गया है। अतः अभियोजन द्वारा मुन्नीदेवी के रक्त सैम्पल के सम्बन्ध में जो लिंक साक्ष्य पेश की गई है वह भी अस्पष्ट है। अतः पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से प्रकट नहीं होता है कि पी.डब्ल्यू.1 मुन्नीदेवी का रक्त सैम्पल कब व किसके द्वारा लिया गया था। अतः पत्रावली पर ऐसी कोई साक्ष्य नहीं है कि जिस रक्त के सैम्पल से डी.एन.ए. टेस्ट किया गया, वह वास्तव में ही मुन्नीदेवी का था। ऐसी स्थिति में एफ.एस.एल. द्वारा दी गई डी.एन.ए. की रिपोर्ट प्रदर्श पी.22 महत्वहीन हो जाती है और उसके आधार पर निश्चित रूप से यह स्थापित नहीं माना जा सकता है कि बरामदशुदा कंकाल परवेज का ही था।
नर कंकाल प्रदर्श पी.6 से जब्त की गयी पेंट बरंग काली धारीदार न्यायालय के समक्ष पेश कर पहचान नहीं करवायी गई है कि वह पेंट परवेज की थी।
अभियुक्त द्वारा परिवादी के भाई परवेज को जान से मारने का कोई हेतुक (Motive) भी नहीं बताया गया है जो कि मौजूदा मामले में महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकती थी। इसके विपरीत पी.डब्ल्यू.4 मोहम्मद आरिफ का स्पष्ट कथन रहा है कि अभियुक्त बाबूलाल उसके साथ परवेज को तलाश करने एवं अनाउन्समेंट करवाने में उसके साथ रहा था, जो अभियुक्त की निर्दोषिता इंगित करता है।
अतः उपरोक्त विवेचन के आधार पर अभियोजन द्वारा पेश की गई साक्ष्य संदिग्ध एवं कमजोर प्रकृति की होने के कारण विश्वास किये जाने योग्य नहीं है। अभियुक्त को इस अपराध से जोड़ने के लिये परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला की प्रत्येक कड़ी इस प्रकार से जुड़ी हुई होनी चाहिये जिससे एक मात्र यही निष्कर्ष निकलता हो कि अभियुक्त द्वारा ही अपराध कारित किया है। किन्तु मौजूदा मामले में अभियुक्त के विरूद्ध लगाये गये आरोप को साबित करने के लिये जो परिस्थितियाँ बताई गई हैं, वे तो सुदृढ़ साक्ष्य से साबित नहीं हुई है, अतः ऐसी साक्ष्य के आधार पर अभियुक्त को हत्या जैसे गम्भीर अपराध में दोषसिद्ध किया जाना सुरक्षित नहीं है।
अतः उपरोक्त विवेचन के आधार पर अभियुक्त के विरूद्ध आरोपित अपराध युक्तियुक्त संदेह से परे साबित नहीं होने से वह संदेह का लाभ प्राप्त करने का अधिकारी है और अभियुक्त बाबूलाल को आरोपित अपराधों में संदेह का लाभ देते हुये दोषमुक्त किया जाता है। फलतः अपील स्वीकार किये जाने योग्य होने से अपील स्वीकार की जाती है और विचारण न्यायालय द्वारा पारित निर्णय एवं दण्डादेश दिनाँक 28.09.2013 को अपास्त किया जाता है। अतः अभियुक्त यदि किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उसे तुरन्त प्रभाव से रिहा किया जावे।
अभियुक्त को यह आदेश दिया जाता है कि वह धारा 437(क) दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत पचास हजार रूपये की जमानत व इसी कदर राशि का मुचलका इस आशय का प्रस्तुत करें कि वह इस प्रकरण के निर्णय के विरूद्ध अपील प्रस्तुत होने पर अपील न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो जायेगा।
विचारण न्यायालय का अभिलेख अविलम्ब लौटाया जाये।
