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Judgment
1- याचीगण की ओर से इस यािचका के माध्य म से, याचीगण एक परमादेश िरट जारी करने की मांग कर रहे हैं, िजसमें प्रत्यु त्तरदातागण को याचीगण के शांितपूणर् जीवन (िलव इन िरलेशनिशप) में हस्त क्षेप न करने का िनदेर्श िदया जाए एवं संबंिधत अिधकािरयों को यह िनदेर्श देने की मांग की गयी है िक वे याचीगण को सुरक्षा प्रदान करें।
2- याचीगण के िव द्वा न अिधवक्ता श्री अमर नाथ िसह एवं उनके सहयोगी अिधवक्ता श्री अक्षां श, अंजू यादव एवं िव द्वा न स्था यी अिधवक्ता श्री प्रिमत कुमार पाल एवं योगेश कुमार को सुना एवं पत्रा वली का पिरशीलन िकया।
3- इस न्या यपीठ के पूवर् आदेश िदनांक 10.09.2026 द्वा रा याचीगण को अिग्र म िनयत ितिथ पर न्या यालय में उपिस्थ त होने का आदेश िकया गया था िजसके अनुपालन में आज न्या यालय में याची सं. 01 कुमारी फरीदा अंसारी एवं याची सं. 02 प्रगित कुशवाहा उपिस्थ त हैं िजनकी पहचान उनके अिधवक्ता द्वा रा िकया गया।
4- याचीगण के िव द्वा न अिधवक्ता का कथन है िक दोनों याचीगण समलैंिगक है और बािलग हैं उम्र के सम्बं ध में उन्हों ने अपने अपने हाई स्कू ल की माकर्शीट की छाया प्रितिलिप संल ग्न की है िजनके अवलोकन से स्प ष्टहोता है िक वे बािलग हैं। िवद्वा न अिधवक्ता का यह भी कथन है िक वे अिववािहत हैं और िलव-इन िरलेशनिशप में रह रहीं हैं। याचीगण के िवद्वा न अिधवक्ता द्वा रा कथन िकया गया िक वय स्क व्यिक्त यों के बीच सहमित से िलव-इन संबंध िकसी अपराध की श्रे णी में नहीं आता है। यह भी िनवेदन िकया गया िक भारत के संिवधान का अनु च्छे द 14 भारत के भीतर कानून की समान सुरक्षा की गारंटी देता है और अनु च्छे द 21 जीवन और व्य िक्त गत स्व तंत्र ता के अिधकार की रक्षा करता है। वतर्मान मामले में याचीगण जो िक अंतरधािमक एवं समलैंिगक हैं और िलव-इन संबंध में होने का दावा करते हैं जो िक उन्हें संिवधान के अनु च्छे द 21 जीवन और व्यिक्त गत स्व तंत्र ता के अिधकार द्वा रा प्रदत्त है। उक्त के अितिर क्तयह भी कथन िकया गया है िक िनजी प्रितवाद और पिरवार के अन्य सदस्य नाराज हो गए हैं और उनके जीवन को गंभीर खतरा है क्यों िक उन्हें धमकी दी जा रही है और परेशान िकया जा रहा है। इसिलए, याचीगण ने िनजी प्रितवािदयों से अपने जीवन की रक्षा के िलए पुिलस अिधकािरयों को िनदेर्श जारी करने के िलए भारत के संिवधान के अनु च्छे द 226 के तहत यह िरट यािचका दायर की है।
5- याचीगण के िव द्वा न अिधवक्ता द्वा रा आगे यह भी कथन िकया गया िक संवैधािनक नैितकता एवं मूल अिधकारों का सार है िक िकसी भी बािलग नागिरक का अपनी स्वे च्छा से जीवन साथी चुनना अथवा सहजीवन का चयन करना उसकी व्यिक्त गत स्वा यत्त ता, गिरमा और िनजता के अिधकार का अिभ न्न िहस्सा है। भारत के संिवधान के अनु च्छे द 21 के तहत प्रदत्त जीवन और वैयिक्त क स्व तंत्र ता का अिधकार हमारे संवैधािनक लोकतंत्र का सवोर् च्च आधार स्त म्भ है। साथ ही उन्हों ने न्या यालय का ध्या न माननीय उच्च तम न्या यालय की िविभ न्न नजीरों पर आकृ ष्टकरते हु ए नवतेज िसह जौहर व अन्य बनाम भारत संघ [(2018) 10 SCC 1] का हवाला िदया िजसमें माननीय उच्च तम न्या यालय ने वय स्क व्यिक्त यों के मध्य सहमितज न्य संबंधों को अपराधमु क्तकरते हुए यह सुस्प ष्टिकया था िक लैंिगक रुझान (sexual orientation) व्यिक्त की स्व तंत्र ता, गिरमा, िनजता और व्यिक्त गत स्वा यत्त ता का अंतिनिहत पहलू है, और न्या यपािलका का यह परम दािय त्व है िक वह लोक नैितकता के स्था न पर संवैधािनक नैितकता का संरक्ष ण सुिनिश्च त करे।
6- िव द्वा न स्था यी अिधवक्ता ने तकर् िदया है िक समलैंिगक िर श्ते की सामािजक स्वी कायर्ता नहीं है। िकसी व्यिक्त को अपनी पसंद का साथी चुनने का अिधकार अनु च्छे द 21 के तहत संरिक्ष त है। हालाँिक, इस तरह के चुनाव की िवधायी मान्य ता एक मौिलक अिधकार नहीं है। आगे उन्हों ने िवरोध प्रकट करते हुए तकर् प्रस्तु त िकया िक समाज का एक पारंपिरक वगर् यह मानता है िक िववाह और पिरवार की व्यवस्था पुरु ष और मिहला के बीच होती है, िजससे वंश आगे बढ़ ता है। उनका तकर् है िक समलैंिगक संबंध इस प्रा कृितक और पारंपिरक ढांचे को प्र भािवत करते हैं।
7- दोनों याचीगण (याची सं. 01 कु.फरीदा अंसारी एवं याची सं. 02 प्रगित कुशवाहा) व्य िक्त गत रूप से आज इस न्या यालय के समक्ष उपिस्थ त हुईं। न्या यालय द्वा रा पूछे जाने पर दोनों ने स्प ष्ट, सुदृ ढ़एवं िनभीर् क शब्दों में यह बयान दजर् कराया िक वे बािलग हैं और उन्हों ने िकसी भी दबाव, भय अथवा अनुिचत प्रभाव के िबना अपनी स्व तंत्र इच्छा व समलैंिगक अिभ रुिच से एक साथ रहने का िनणर्य िलया है। उन्हों ने न्या यालय को अवगत कराया िक वे एक- दूसरे के साथ ही सहजीवन (िलव-इन िरलेशनिशप) में रहना चाहती हैं तथा भिवष्य में भी साथ ही रहेंगी। न्या यालय ने उनका व्यिक्त गत साक्षा त्का र कर यह पाया िक दोनों वय स्क हैं, अपने भले-बुरे को समझने में पूणर्तः सक्ष म हैं और उनका यह िनणर्य स्व तंत्र सहमित पर आधािरत है।
याची सं. 01 कु.फरीदा अंसारी एवं याची सं. 02 प्रगित कुशवाहा द्वा रा एक सफेद कागज में बयान अंिकत िकया गया िजसको प त्रा वली पर रखा गया िजसका सार िन म्न वत है।
"िजसमें याची सं. 01 कुमारी फरीदा अंसारी द्वा रा बयान में कथन िकया िक वह याची सं. 02 के साथ समलैंिगक संबंध में हैं और साथ रह रहे हैं। हम दोनों वय स्क हैं और हम दोनों को एक दूसरे के साथ रहने में कोई आपित्त नहीं है उन्हों ने आगे यह भी कथन िकया िक प्रितवादी संख्या 5 (शाहबु द्दी न अंसारी) और प्र ितवादी संख्या 6 (प्रे म कुशवाहा) द्वा रा उनके शांितपूणर् जीवन में बाधा उत्प न्न की जा रही हैं, इसिलए प्रितवािदयों को ऐसा करने से रोकने का अनुरोध िकया गया है।
याची सं. 02 कुमारी प्रगित कुशवाहा द्वा रा बयान में कथन िकया िक वह याची सं. 01 के साथ समलैंिगक संबंध में हैं और साथ रह रहे हैं। हम दोनों वय स्क हैं और हम दोनों को एक दूसरे के साथ रहने में कोई आपित्त नहीं है उन्हों ने आगे यह भी कथन िकया िक प्रितवादी संख्या 5 (शाहबु द्दी न अंसारी) और प्रितवादी संख्या 6 (प्रे म कुशवाहा) द्वा रा उनके शांितपूणर् जीवन में बाधा उत्प न्न की जा रही हैं, इसिलए प्रितवािदयों को ऐसा करने से रोकने का अनुरोध िकया गया है।"
9- माननीय उच्च तम न्या यालय का िनणर्य: समलैंिगक युगलों तथा क्वी यर समुदाय के अिधकारों एवं उनकी िविधक िस्थ ित पर माननीय सवोर् च्च न्या यालय की संिवधान पीठ द्वा रा सुिप्र यो उफर् सुिप्र या चक्र वतीर् व अन्य बनाम भारत संघ [(2023) SCC OnLine SC 1348] में िव स्तृ त िवचार-िवमशर् िकया गया के िनणर्य के “प्र स्त र 149” में शीषर् अदालत ने अपने िन ष्क षोर्ं एवं िविधक िस्थ ित को िन म्ना नुसार समािहत िकया है:
“149.This court hereby summarizes its conclusions and directions as follows: i. There is no unqualified right to marriage except that recognised by statute including space left by custom. ii. An entitlement to legal recognition of the right to union – akin to marriage or civil union, or conferring legal status upon the parties to the relationship can be only through enacted law. A sequitur of this is that the court cannot enjoin or direct the creation of such regulatory framework resulting in legal status. iii. The finding in (i) and (ii) should not be read as to preclude queer persons from celebrating their commitment to each other, or relationship, in whichever way they wish, within the social realm. iv. Previous judgments of this court have established that queer and LGBTQ+ couples too have the right to union or relationship (under Article 21) – 'be it mental, emotional or sexual' flowing from the right to privacy, right to choice, and autonomy. This, however, does not extend to a right to claim entitlement to any legal status for the said union or relationship. v. The challenge to the SMA on the ground of under classification is not made out. Further, the petitioner's prayer to read various provisions in a 'gender neutral' manner so as to enable same-sex marriage, is unsustainable. vi. Equality and non-discrimination are basic foundational rights. The indirect discriminatory impacts in relation to earned or compensatory benefits, or social welfare entitlements for which marital status is a relevant eligibility factor, for queer couples who in their exercise of choice form relationships, have to be suitably redressed and removed by the State. These measures have to be taken by the Union and State governments.”
10- सुिप्र यो (उपरो क्त) के “प्र स्त र 149” के उप-खंड (iv) से यह पूणर्तः स्था िपत और िनिववाद है िक क्वी यर तथा एलजीबीटी क्यू + युगलों को भारत के संिवधान के अनु च्छे द 21 के अंतगर्त संबंध या सहजीवन (union or relationship) स्था िपत करने का अक्षु ण्ण मौिलक अिधकार प्रा प्त है—चाहे वह मानिसक, भावना त्म क अथवा शारीिरक सहचयर् हो जो िनजता के अिधकार, पसंद की स्व तंत्र ता और व्यिक्त गत स्वा यत्त ता से सीधे उद्भू त होता है। यद्य िप ऐसे संबंधों को िविध के तहत वैवािहक दजार् प्रदान करना िवधाियका के क्षेत्रा िधकार में है, तथािप दो वय स्क नागिरकों के साथ रहने और शांितपूणर् सहजीवन व्यतीत करने के मूल अिधकार को संिवधान का संपूणर् संर क्षण प्रा प्त है।
11- उक्त के संदभर् में यह स्प ष्टिकया िक जब दो वय स्क व्यिक्त स्वे च्छा से साथ रह रहे हों , तो उनकी लैंिगक पहचान या सामािजक िवरोध के आधार पर उनके जीवन और स्व तंत्र ता पर कोई आंच नहीं आने दी जा सकती।
12- उभय पक्षों के तकोर्ं एवं याचीगण के बयानों एवं सवोर् च्च न्या यालय एवं उच्च न्या यालय की द्वयपीठ की प्रमुख नजीरो को ध्या न में रखते हुए न्या यालय इस िन ष्क षर् पर पहुं चती है िक जब दो वय स्क नागिरक अपनी व्यिक्त गत स्वा यत्त ता और पसंद से एक साथ रहने का िनणर्य लेते हैं, तो भारत के संिवधान के अनु च्छे द 21 के अंतगर्त सहजीवन (िलव-इन िरलेशनिशप) में रहना उनका मौिलक अिधकार है। पिरवार के सदस्यों , संबंिधयों अथवा समाज के िकसी भी वगर् को उनके इस शांितपूणर् सहजीवन में िवघ्न डालने, उन्हें डराने-धमकाने अथवा उनकी शारीिरक स्व तंत्र ता का हनन करने का कोई िविधक अिधकार नहीं है। वैवािहक मान्य ता का अभाव िकसी भी तीसरे पक्ष या प्रशासिनक तंत्र को वय स्क नागिरकों की गिरमा और शारीिरक सुरक्षा पर प्र हार करने की छूट नहीं देता। जीवन और वैयिक्त क स्व तंत्र ता का अिधकार संवैधािनक व्यवस्था में सवोर् पिर है। साथ ही सहजीवन एवं स्वा यत्त ता का अिधकार (अनु च्छे द 21): नवतेज िसह जौहर एवं सुिप्र यो बनाम भारत संघ के िनणर्यों का संदभर् लेते हुए यह स्प ष्टिकया गया है िक दो बािलग व्यिक्त यों को आपसी सहमित से भावना त्म क, मानिसक और शारीिरक संबंध बनाने का मौिलक अिधकार प्रा प्त है। अपनी पसंद का साथी चुनना व्यिक्त की िनजता, स्वा यत्त ता और गिरमा का अिभ न्न िहस्सा है। सुिप्र यो मामले (प्र स्त र 149) के अनुसार, यद्य िप समलैंिगक िववाह को िविधक मान्य ता देना िवधाियका के अिधकार क्षेत्रमें है, िकतु दो बािलग व्यिक्त यों के शांितपूणर् सहजीवन (िलव-इन संबंध) पर कोई कानूनी रोक नहीं है और इसे संिवधान का पूणर् संर क्षण प्रा प्त है।
13- उपरो क्तिविधक िस्थ ित एवं संवैधािनक अिधदेशों के दृिष्ट गत इस न्या यालय का अिभमत है िक याचीगण, अनु च्छे द 21 के अंतगर्त पूणर्तः संरिक्ष त हैं, याचीगण बािलग है, समलैंिगक हैं, िशिक्ष त हैं, अपना भला-बुरा समझने में पूणर्तः सक्ष म है, खूब सोच-िवचार करने के पश्चा त एक साथ रहने का िनणर्य िलया है िजस पर िकसी के द्वा रा जोर जबरद स्ती नहीं की गयी है अतः याचीगण द्वा रा िलव इन िरलेशनिशप में एक साथ रहने का िवरोध करने का िकसी को कोई अिधकार नहीं है तथा न्या यालय को उनकी सुरक्षा प्रदान करने की प्रा थर्ना को स्वी कार न करने का कोई कारण नहीं िदखता तथा उनकी यह यािचका स्वी कार िकये जाने यो ग्य है।
14- तद्नु सार यह यािचका स्वी कार की जाती है। याचीगण को शांितपूणर् ढंग से एक साथ रहने की स्व तंत्र ता है तथा उनके पिरवारीजन या अन्य िकसी व्यिक्त को उनके एक साथ िलव-इन िरलेशनिशप में रहने में हस्त क्षेप करने की अनुमित नहीं दी जाएगी।
15- यिद याचीगण के शांितपूणर् जीवन में िकसी प्रकार की बाधा उत्प न्न होती है, तो याचीगण इस आदेश की प्रमािणत प्रित के साथ संबंिधत पुिलस आयु क्त/एसएसपी/एसपी से संपकर् करेंगे और पुिलस अिधकारी यह सुिनिश्च त करने के बाद िक याचीगण वय स्क हैं और स्वे च्छा से एक साथ रह रहे हैं, याचीगण को तत्का ल सुर क्षा प्रदान करेंगे।
16- िनजी प्रत्यु त्तरदाता को यह स्व तंत्र ता प्रदान की जाती है िक यिद याचीगण द्वा रा अिभलेख पर लाए गए दस्ता वेज मनगढ़ न्त या फजीर् हैं तो वे इस आदेश को वापस लेने के िलए िरकॉल आवेदन दायर करने के िलए स्व तंत्र हों गे।
17- इस िनणर्य को समा प्त करते हुए, मेैं अपनी िरसचर् एसोिसएट सुश्री जा ह्न्वी िसह के समिपत शोध प्रयासों के प्रित अपना आभार व्यक्तकरता हूं।
