High CourtsSingle Bench(2023) 04 AHC CK 0019

Arpit Sharma vs State Of U.P.

Allahabad High Court · Decided on 4 April 2023

HON’BLE JUDGES
Dr. Gautam Chowdhary, J
CASE NUMBER
Criminal Misc. Bail Application No. 52841 Of 2022

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Judgment

40 paragraphs · 1,824 words

Dr. Gautam Chowdhary, J

वर्तमान दाण्डिक प्रकीर्ण जमानत प्रार्थना पत्र आवेदक अर्पित शर्मा की ओर से मु०अ०स० 0240/2022, अन्तर्गत धारा 302, 506 भा०दं०वि०, थाना गागलहेड़ी, जिला सहारनपुर में जमानत पर मुक्त करने हेतु प्रस्तुत किया गया है।

अभियोजन कथानक संक्षेप में इस प्रकार है कि वादी मुकदमा की शादी दि० 22.04.2016 को विशाखा शर्मा पुत्री अशोक कुमार शर्मा के साथ हुई थी। वर्ष 2018 में वादी की पत्नी विशाखा ने अस्पताल में पुत्री ध्वनि को जन्म दिया और अस्पताल से ही अपने मायके चली गयी। वादी व उसके परिवारजनों ने उसे अपने घर लाने का बहुत प्रयास किया, किंतु वह वादी के परिवार वालों पर झूठे आरोप लगाकर ससुराल वापस नहीं आना चाहती थी। इसी बात को लेकर वादी की पत्नी विशाखा, साला अर्पित शर्मा, चाचा मनोज कुमार शर्मा, मुंहबोला भाई पंकज शर्मा व मुंहबोला फूफा सतीश त्यागी भी एक वर्ष पूर्व उसके व उसके परिवार को जान से मारने की धमकी दे चुके है। दि० 16.08.2022 को वादी के पिता अनिल शर्मा, माता आशा शर्मा व बहन यश्वी शर्मा अपने कॉलोनी में टहल रहे थे, कि अचानक करीब 06.20 बजे शाम को वादी का साला अपने काले रंग की पल्सर मोटरसाइकिल सं०- UK 17 C 6284 से आया और वादी की माता व बहन के सामने ही उसके पिता अनिल शर्मा को गोली मारकर उनकी हत्या कर दी तथा जाते हुये उसकी माता व बहन को जान से मारने की धमकी देकर भाग गया। गोली की आवाज सुनकर मोहल्ले के काफी लोग आ गये, जिनकी मदद से उसके पिता को घायल अवस्था में हरोडा अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टर द्वारा उसके पिता को मृत घोषित कर दिया गया। वादी के इस प्रार्थना पत्र/तहरीर के आधार पर अभियुक्त के विरूद्ध मुकदमा पंजीकृत किया गया।

आवेदक के विद्वान अधिवक्ता श्री गौरव कक्कर, आदित्य उपाध्याय, नरेन्द्र उपाध्याय व शिखा शुक्ला व परिवादी के विद्वान अधिवक्ता श्री राजीव कुमार सिंह एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता श्री अनिल कुमार कुशवाहा को सुना तथा पत्रावली का परिशीलन किया।

आवेदक के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया किः-

1- आवेदक को इस प्रकरण में गलत एवं फर्जी ढंग से झूठा फंसाया गया है, उसने कथित अपराध कारित नहीं किया है।

2- आवेदक द्वारा मृतक की हत्या नहीं की गयी और न ही मृतक व उसके परिवार को जान से मारने की धमकी दी गयी।

3- आवेदक देहरादून, उत्तराखंड में निवास कर रहा था और तथाकथित घटना सहारनपुर, उ०प्र० में घटित हुई।

4- आवेदक की बहन द्वारा अभियुक्त व उसके परिवार वालों के विरूद्ध 03 वाद/मुकदमे दायर किये गये थे। इसलिए आवेदक को इस मामले में झूठा फंसा दिया गया। मामले के तथाकथित घटना स्थल के नक्शा-नजरी में प्रत्यक्षदर्शी साक्षी द्वारा यह कथन नहीं किया गया कि आवेदक कहां पर खड़ा था। इस तथाकथित घटना के नक्शा-नजरी में आवेदक द्वारा 13 कदम की दूरी से फायर करना दर्शाया गया है, जबकि मृतक के शरीर पर पायी गयी आग्नेयास्त्र की चोट में ब्लैकनिंग व टेटोइंग (Blackening & tattooing) आना दर्शित है, जो तथाकथित घटना के संदिग्धता को प्रदर्शित कर रहा है।

5- मृतक के शव विच्छेदन आख्या के अनुसार मृतक के शरीर पर निम्न चोटे आना दर्शित है-

1.

Fire arm entry wound (1) 3*2 cm on Rt Scapular region C blackning & tatooing margine inverted in interior angle of scapula.

2.

Exit Wound (1) fire arm 3*3 cm on rt side in Iind intercostal space 1 cm away laterally from mid sternal line margine are everted.

3.

Fire arm entry wound (2) 3*3 cm on rt scapular region towards treperices muscle 3 cm away from spinal cord & 4 cm below from nape of neck C blackening & tattooing & margine are inverted.

4.

Multiple Abrasion in area 9*5 cm on dorsam of 14 foot.

5.

Two X-ray plate received/C 289 Sunil Tomar.

6- इसके संबंध में आवेदक के विद्वान अधिवक्ता द्वारा Modi A Textbook of Medical Jurisprudence and Toxicology के प्रस्तर 25.7.1.1 में उल्लिखित निम्नलिखित पंक्तियो की ओर न्यायालय का ध्यान आकृष्ट किया, "At a distance of 12 feet, the charge of the shot spreads widely and enters the body as individual pellets producing separate openings in an area of five to eight inches in diameter depending on the choke but without causing blackening, scorching or tattooing of the surrounding skin." उक्त पंक्तियों से यह प्रकट हो रहा है कि यह तथाकथित मामले में सुनियोजित योजना के तहत आवेदक के विरूद्ध पंजीकृत करायी गयी है।

7- आवेदक निर्दोष है तथा वह इस प्रकरण में दि० 17.06.2022 से कारागार में निरुद्ध है। इसलिए आवेदक को जमानत पर छोड़ दिया जाय।

परिवादी के विद्वान अधिवक्ता एवं विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता ने अभियुक्त के जमानत का प्रबल विरोध करते हुए निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत कियाः-

1- उभय पक्षों के मध्य वैवाहिक विवाद की रंजिश के कारण ही अभियुक्त द्वारा यह अपराध कारित किया गया। इसलिए अभियुक्त को जमानत पर न छोड़ा जाय।

2- अभियुक्त द्वारा आग्नेयास्त्र से अभियोगी के पिता की हत्या की है तथा मामले की प्रत्यक्षदर्शी साक्षी/अभियोगी के माता व बहन को भी जान से मारने की धमकी देने का आरोप है।

3- नक्शा-नजरी में अभियुक्त द्वारा 13 कदम की दूरी से फायर करना दर्शित किया गया है तथा इस घटना की प्रत्यक्षदर्शी साक्षी अभियोगी की माता व बहन है।

4- मृतक अनिल शर्मा के शव परीक्षण आख्या के अनुसार मृतक की मृत्यु, मृत्यु पूर्व गनशॉट इंजरी के परिणामस्वरूप शॉक व हैमरेज के कारण होना दर्शित है।

5- अभियुक्त द्वारा कारित अपराध संंज्ञेय एवं गंभीर प्रकृति का है, इसलिए अभियुक्त को जमानत पर न छोड़ा जाय।

मैंन पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य का गहनतापूर्वक परिशीलन किया तथा उभय पक्ष के विद्वान अधिवक्ताओं के तर्कों पर सम्यक रूप से विचार किया गया। मेरा अभिमत है किः-

1- Rajasthan Vs. Balchand alias Baliay (AIR 2447, 1978) के ऐतिहासिक फैसले में 1978 के मामले में सटीक रूप से कहा गया है कि: "मूल नियम को शायद जमानत के रूप में रखा जा सकता है, जेल नहीं।" इसे आधार बनाने के लिए भारत के संविधान के तहत एक अभियुक्त को गारंटीकृत अधिकारों पर जोर दिया। इन अधिकारों में सबसे विशिष्ट अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत दिया गया अधिकार है। किसी व्यक्ति की हिरासत उसके जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित करती है और हिरासत का मुख्य उद्देश्य बिना किसी असुविधा के मुकदमे के लिए आरोपी की आसानी से उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

2- इस प्रकार, यदि यह सुनिश्चित किया जाता है कि अभियुक्त विचारण चरण के लिए आवश्यक होने पर उपलब्ध हो, तो व्यक्ति को हिरासत में लेना अनिवार्य नहीं है। इसलिए, यह माना गया कि अदालतों को, किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी से संबंधित दंड प्रक्रिया संहिता (सी०आर०पी०सी०) के प्रावधानों की व्याख्या करते समय, हिरासत से बचना चाहिए जब तक कि यह अपरिहार्य न लगे और आरोपी को जमानत दे देनी चाहिए।

3- मानवाधिकार सक्रियता पिछले कुछ वर्षों में अधिक विकसित हुई है और वर्तमान में जेल में निरूद्ध किये जा रहे किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता और समाज के हित के बीच संतुलन की समझ की आवश्यकता है। इसलिए, दोनों के बीच इस तरह के संतुलन को बनाए रखने के लिए यह विचार करना बहुत महत्वपूर्ण है कि जब तक कोई मजबूत आधार न हो जैसे कि एक अभियुक्त के न्याय से भागने की संभावना या उसके द्वारा सबूतों से छेड़छाड़ करने या मामले के गवाह या पीड़ित को धमकी देने की संभावना, किसी अभियुक्त को हिरासत में लेने से संविधान के अनुच्छेद - 21 के तहत उसे दिए गए उसके मौलिक अधिकार यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन होगा।

4- इसके अलावा, सजा के सुधारवादी सिद्धांत का प्रयोग दंड के दो अन्य सिद्धांतों क्रमश: निवारक सिद्धांत और दंडात्मक सिद्धांत के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। सुधारवादी सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य एक अभियुक्त को सुधारना और उसे जेल में आदतन अपराधियों से दूर रखना है, जिन्हें अपराधों की विविधता माना जाता है।

5- यह सिद्धांत इस धारणा पर आधारित है कि दंड एक निवारक के बजाय अधिक उपचारात्मक होना चाहिए। इस प्रकार के सिद्धांत के तहत किसी अपराध को एक बीमारी माना जाता है जिसे मारने से ठीक नहीं किया जा सकता है; बल्कि इस तरह के रोग को 'सुधार की प्रक्रिया' (process of reformation) के नाम की दवा की सहायता से ठीक किया जा सकता है।

6- इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (A.I.R 1277 OF 2014) के मामले में पारित ऐतिहासिक फैसले में, उच्चतम न्यायालय ने गिरफ्तारी से पहले और गिरफ्तारी के बाद पुलिस की शक्तियों पर कई नियंत्रण और संतुलन लगाए। माननीय उच्चतम न्यायालय ने देश भर की सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे पुलिस अधिकारियों को निर्देश दें कि वे मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों की जांच किए बिना किसी आरोपी को गिरफ्तार न करें और गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच करें।

7- एक सार्वभौमिक सत्य यह भी है कि गिरफ्तारी अपने साथ बहुत अपमान भी लाती है, किसी की स्वतंत्रता को कम करती है और एक अभियुक्त के चरित्र पर हमेशा के लिए एक निशान छोड़ जाती है। एक जेल में बंद अभियुक्त अपनी नौकरी/प्रतिष्ठा खो देता है। इस तरह उसकी नजरबंदी का बोझ उसके परिवार के निर्दोष सदस्यों पर भी पड़ता है। स्थिति तब और भी खराब हो जाती है जब जेल में बंद व्यक्ति परिवार में एकमात्र कमाने वाला होता है और उसके कारावास से उसके निर्दोष आश्रितों को अनावश्यक पीड़ा होती है।

8- इस प्रकार न्यायालय को सबूतों की प्रकृति और किसी भी ठोस विरोधाभाष सामग्री की अनुपस्थिति एवं उपलब्ध सामग्री से छेड़छाड़ की संभावना न होने के तथ्य को देखते हुए अभियुक्त को जमानत पर मुक्त कर दिया जाना चाहिए।

इस प्रकार उपरोक्त अभिमत के मद्देनजर आवेदक के विद्वान अधिवक्ता के तर्कों के परिप्रेक्ष्य में पत्रावली पर उपलब्ध सारवान तथ्यों एवं परिस्थितियों का समग्र रूप से अवलोकन करने के बाद, सबूतों की प्रकृति और किसी भी ठोस विरोधात्मक सामग्री की अनुपस्थिति एवं उपलब्ध सामग्री से छेड़छाड़ की संभावना न होने के तथ्य को देखते हुए मेरी राय में आवेदक को जमानत पर मुक्त करने का उपयुक्त आधार है।

अतः वाद के गुण-दोष पर बिना कोई टिप्पणी किए हुए आवेदक को उपरोक्त वर्णित अपराध में संबंधित न्यायालय की संतुष्टि पर व्यक्तिगत बंध-पत्र एवं अधिक धनराशि के दो स्थानीय प्रतिभू प्रस्तुत करने पर निम्नलिखित शर्तों के साथ जमानत पर छोड़ दिया जाय।

1.

आवेदक विवेचना या परीक्षण के दौरान अभियोजन साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा।

2.

आवेदक अभियोजन साक्षियों व पीड़िता/ शिकायतकर्ता को डरायेगा/धमकायेगा नहीं।

3.

आवेदक न्यायालय के आदेशों का पालन करेगा, वह परीक्षण के दौरान बिना कोई अनावश्यक स्थगन लिए नियत तिथि पर न्यायालय में उपस्थित होगा तथा परीक्षण में ईमानदारी से सहयोग करेगा।

4.

आवेदक जमानत पर रिहा होने के बाद जमानत की स्वतंत्रता का दुरूपयोग नही करेगा और किसी भी अपराधिक गतिविधि में लिप्त नहीं होगा न कोई अपराधिक कृत्य करेगा।

5.

आवेदक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति या पुलिस अधिकारियों को कोई प्रलोभन या धमकी नहीं देगा न ही उनसे कोई वायदा करेगा, जिसके कारण उन्हें न्यायालय में तथ्यों को उजागर करने से विरत रहना पडे़।

उपरोक्त शर्तों में से किसी के उल्लंघन के मामले में, परीक्षण न्यायालय आवेदक की जमानत नियमानुसार रद्द करने को स्वतंत्र है।